परदेसी बेटा

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गांव के छोर पर जो पुरानी खपरैल की कोठी थी, उसके आंगन में हर सुबह एक औरत बैठती थी। उसका नाम सुमित्रा था। पचास बरस की उम्र में भी उसकी निगाहें अभी तरुणाई वाली तेजी से चाल में रहती थीं। वह रोज़ भोर होते ही आंगन में आ जाती, हाथ में एक पुरानी चिट्ठी पकड़े रखती — जो तीन साल पहले शहर से आई थी।

उसका बेटा राज शहर जा गया था। सपने थे बड़े, पैसे कमाने के। माता-पिता को खुशहाल करने की कसम खाई थी। सुमित्रा ने हंसते हुए भेज दिया था — बेटा सफल हो, क्या चिंता है। लेकिन तीन साल हो गए। तीन बरसात आ गई, तीन गर्मियां निकल गईं। राज का एक फोटो आया था कभी, व्हाइट कॉलर नौकरी वाली ड्रेस पहने, हंसता हुआ। लेकिन उस हंसी में कोई जानी-पहचानी बात न थी।

सुमित्रा के पति राधेश्याम अब ज़्यादा बोलते नहीं थे। पहले गांव की चौपाल में बैठते, नई बातें करते, खांसते-हंसते रहते। अब सुबह की चाय पीते और चुप बैठ जाते। खेत की चिंता करते, लेकिन खेत में जाने की ताकत न रहती। बेटा न हो तो औरत को भी साहस टूट जाता है, यह सुमित्रा ने पहली बार समझा था।

फिर एक बारिश की रात आई। बिजली कड़क रही थी, आसमान पागल हो रहा था। सुमित्रा घर के बाहर बेरंग आंखों से आकाश देख रही थी। तभी सड़क से एक आवाज़ सुनाई दी। किसी ने नाम पुकारा था। सुमित्रा! बस इतना ही। एक शब्द। लेकिन वह शब्द उसके पूरे शरीर में बिजली दौड़ा गया।

बाहर दौड़ी तो देखा — राज खड़ा था। ठीक वैसा नहीं जैसा फोटो में था। गीला, भीगा हुआ, सूखे होंठ, थके चेहरे। लेकिन वही था। अपना बेटा। शहर के सोने को उतारकर फिर से अपना बेटा।

सुमित्रा ने पूछा नहीं कि क्यों आया, क्या हुआ। बस उसे अंदर ले गई। राधेश्याम को जगाया। दोनों रात भर उसे देखते रहे, बस देखते रहे। किसी ने खाना खाने के लिए नहीं कहा, किसी ने सवाल नहीं किए।

सुबह राज ने बताया — शहर में सब कुछ था। पैसा, नाम, सब कुछ। पर घर न था। खाना बनता था, पर अम्मा की खुशबू न थी। सोता था, पर आंगन की शांति न थी। एक रात सपना आया — अम्मा आंगन में बैठी हैं, दीये जला रहीं हैं। और जैसे ही दीया जला, वह जाग गया। और फिर जान गया कि सब हारा हुआ है अगर अपने न हों।

उस दिन के बाद राज वापस न गया शहर में। उसने अपनी नौकरी छोड़ दी। गांव के स्कूल में मास्टरी ली। रोज़ आंगन में बैठता, सुमित्रा के पास। और सुमित्रा हर दिन उसका प्रिय खीर बनाती। राधेश्याम के चेहरे पर फिर से हंसी आ गई।

परदेसी बेटा घर आ गया था। अब वह परदेसी न था, बस बेटा था। और यह सबसे बड़ी दौलत थी।


🪔 सीख: जीवन की सबसे बड़ी सफलता रुपये-पैसे नहीं, बल्कि अपनों के पास होना है। घर और परिवार का प्यार दुनिया की किसी भी सफलता से ज़्यादा मूल्यवान है।

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