परदेसी बेटा
गांव के सिरे पर एक छोटी-सी पक्की कोठरी थी, जहां रामकिशोर और उनकी पत्नी लक्ष्मी रहते थे। उनका एकलौता बेटा राजू दिल्ली चला गया था। तीन साल पहले, जब राजू शहर जाते समय मां की आंचल पकड़ी थी, तब लक्ष्मी को लगा था कि उसका जीवन आधा रह जाएगा। बस, उसी दिन से शुरू हुई बेइंतहा प्रतीक्षा।
रामकिशोर हर सुबह घर के सामने बैठते और गांव के चौपाल पर जाते, जहां राजू के बारे में कोई खबर मिल सके। लक्ष्मी घर में रहकर देवी दुर्गा की मूर्ति के सामने दीये जलाती और राजू के सकुशल होने की कामना करती। घर के आंगन में जो नीम का पेड़ था, उसके नीचे बैठकर वह अपने बेटे को याद करती थी।
महीनों में एक बार राजू का पत्र आता। रुपये के साथ कागज़ के टुकड़े पर लिखी कुछ पंक्तियां। लक्ष्मी उन्हें बार-बार पढ़ती, शब्दों को होंठों पर रखती, जैसे अपने बेटे को छू रही हो। लेकिन पत्र में कभी नहीं लिखा होता कि वह कब लौटेगा।
दिवाली का महीना आया। रामकिशोर ने बाज़ार से पीली मिट्टी मंगवाई और आंगन को लीपा-पोता। लक्ष्मी ने गुलाब जामुन बनाए, राजू के पसंद के। पड़ोसियों के बेटे गांव लौट आए, लेकिन राजू की कोई खबर नहीं थी। लक्ष्मी की खामोशी उस साल की दिवाली में घर भर गई।
सर्दियों की एक शाम, जब तारे निकलने लगे थे, गांव के चौराहे पर एक जवान दिख गया। पैरों में धूल थी, चेहरे पर अपरिचित सी गंभीरता थी। वह राजू था। दिल्ली की मेहनत ने उसे बदल दिया था, लेकिन जैसे ही वह घर के द्वार पर खड़ा हुआ, मां की दहलीज पार करते ही, सब कुछ भूल गया।
लक्ष्मी ने अपने बेटे को पहचान लिया। आवाज़ नहीं निकली, बस आंसू बह गए। रामकिशोर की कांपती हुई बाहें राजू को घेर लीं। उस रात घर में दीये की रोशनी फिर से जग उठी थी, न कि बिजली से, बलकि प्रेम की अमर ज्योति से।
राजू ने अपनी मां की ओर देखा। उसके चेहरे की सिलवटों में तीन साल की प्रतीक्षा दिख गई। उसने माता-पिता के पैर छुए। वह शहर का सफल व्यक्ति बन गया था, लेकिन उसी पल समझ गया कि असली धन तो यही था—प्रेम, विश्वास और इंतज़ार।
🪔 सीख: प्रेम और विश्वास की नींव पर बना संबंध कितने भी दूरी, कितने भी वक्त को सहन कर सकता है। बेटे की सफलता महत्वपूर्ण है, लेकिन माता-पिता का प्रेम और उनकी खुशी ही असली धन है। दूरी और भौतिक सफलता कभी हृदय के बंधन को तोड़ नहीं सकती।




