परदेसी बेटा
गांव के उस छोर पर जहां खेत खत्म होते हैं और आसमान शुरू होता है, वहां एक छोटी सी कच्ची चिलकोरी खड़ी थी। इसी घर में रहते थे दिलीप के माता-पिता। दिलीप अब मुंबई में बैंक में काम करता था। गांव से शहर जाना उसकी मजबूरी थी, मां का सपना नहीं था।
हर शाम को दिलीप की मां शांति देवी चिलकोरी की छत पर चढ़ जाती थीं। वहां से वह सड़क को देखती रहती थीं जो गांव को मुंबई से जोड़ती थी। उनके हाथों में हमेशा एक पुरानी चादर होती थी जिसे दिलीप ने बचपन में ओढ़ा था। गांव की महिलाओं को यह बहुत अजीब लगता था, पर शांति देवी को किसी की परवाह नहीं थी।
दिलीप के पिता रामकिशोर सुबह जल्दी खेत में निकल जाते थे। लेकिन उनका मन खेत में नहीं रहता था। वह अपने बेटे के लिए चिंतित रहते थे कि वह शहर में अकेले कैसे रह रहा होगा। खाना ठीक से खा रहा होगा कि नहीं? रातों को सोता भी है कि नहीं? पर उन्होंने कभी कोई शिकायत दिलीप से नहीं की।
दिलीप भी परदेस में अकेला था। हर शाम को वह कंपनी के कॉलोनी में बैठकर गांव के बारे में सोचता था। मां की बीमारियों, पिता की झुकती कमर, और अपने बचपन की उस नीम के पेड़ के नीचे की यादें सताती थीं। लेकिन घर भेजे गए पैसे ही तो उसकी मां-बाप की ताकत थे।
एक दिन दिलीप को बखार में बुखार आ गया। वह अकेले अस्पताल में लेटा था और बस रो सकता था। उसी समय उसका फोन बजा। मां की आवाज़ सुनकर उसे लगा कि दुनिया फिर से सही जगह पर आ गई है। मां ने दूर से ही उसकी हर बीमारी का इलाज बता दिया – तुलसी, शहद, घी, दाल का पानी। पिता फोन पर आए और बस एक बार पूछा, ‘बेटा, अब ठीक है न?’
दिलीप ने उस दिन समझा कि परदेस में कमाई से ज़्यादा अहम था – घर के लिए कुछ छोड़ना। उसने तय किया कि हर महीने एक दिन वह सुबह-सुबह वीडियो कॉल करेगा। मां और पिता को दिखाएगा कि वह ठीक है। और पिछली दिवाली पर, दिलीप ने अपनी सारी बचत लगाकर एक टिकट खरीद लिया।
जब दिलीप गांव लौटा, तो मां ने उसे देखते ही रोना शुरू कर दिया। पर वह खुशी के आंसू थे। पिता के चेहरे पर एक मुस्कुराहट थी जो साल भर की चिंता को मिटा गई। उस रात, तीनों ने साथ बैठकर खीर खाई। और दिलीप को समझ आ गया कि असली दौलत यही है – घर में एक-दूसरे को देखना, महसूस करना, और प्यार में रहना।
परदेस में रहकर भी दिलीप गांव में था। और गांव में बैठकर भी मां-बाप हमेशा अपने बेटे के साथ थे। यही परदेस का सच है – दूरियां कभी प्यार को दूर नहीं कर पातीं।
🪔 सीख: परदेस में सफलता पाना महत्वपूर्ण है, पर प्रेम और रिश्तों को जीवित रखना उससे भी ज़्यादा जरूरी है। दूरी को कम करना हमेशी संभव नहीं, लेकिन हृदय की दूरी को मिटाया जा सकता है – एक फोन कॉल, एक मिलन, और प्यार के लिए समय निकालने से।



