गांव के किनारे ऊँची पहाड़ी पर छतनाल की झोपड़ी थी, जहाँ से पूरे गांव का दृश्य दिखता था। बलराज की माँ हर सुबह अपनी सफेद साड़ी पहनकर उसी पहाड़ी पर बैठती थी, पश्चिम की ओर ताकती रहती थी। बीस साल पहले जब उसका बेटा मुंबई के लिए निकला था, तो माँ ने कहा था, ‘जब तुम लौटोगे, तो मैं यहीं तुम्हारा इंतज़ार करूँगी।’
बलराज का पिता रामधीन अब बुज़ुर्ग हो गया था। उसके हाथ में कम्पन था, पर गाँव के चौपाल पर रोज़ सांझ को बैठता था। वहाँ वह अपने बेटे की कहानियाँ सुनाता था — कैसे बलराज बड़ी कंपनी में काम करता है, कैसे उसने मकान खरीदा, कैसे बहू और पोते हैं। गांववासी सुनते और सोचते कि आखिर कब यह परदेसी बेटा गांव आएगा।
साल दर साल फोन की घंटी बजती, दूरभाष से बात होती। बलराज कहता था, ‘माँ, अभी एक साल और, फिर सब छोड़कर आ जाऊँगा।’ पर बहू की नौकरी है, बेटे की स्कूल है, मकान का कर्ज़ है — कारण हमेशा कोई न कोई होता। माँ हर बार हँसकर कहती, ‘ठीक है बेटा, जब आ पाएगा।’ पर रात को तकिए पर आँसू गिरते थे।
एक दिन माँ की तबीयत बिगड़ गई। बुखार चढ़ा। पड़ोसियों ने सुझाया कि बलराज को बुलाओ। रामधीन ने फोन किया। तीन हज़ार किलोमीटर दूर मुंबई में बेठा बलराज कंपन में हाथ से फोन गिराते हुए रो पड़ा। अगले दिन का टिकट काट लिया। बीस साल, दूरियों में खोया समय, सब कुछ पल भर में अर्थहीन हो गया।
जब बलराज की कार गाँव में घुसी, तो पूरा गाँव सड़क पर आ गया। पर उसे किसी की परवाह नहीं रही। वह सीधा उस पहाड़ी पर गया जहाँ उसकी माँ बैठी थी, कमज़ोर, पर आँखों में अब भी वही इंतज़ार।
बलराज अपनी माँ के पैरों पर गिर गया। माँ ने हाथ उठाया, पर हाथ कँपते हुए रुक गए। बीस साल का सब्र एक पल में टूट गया। माँ ने अपने बेटे का सिर अपनी गोद में रखा और कहा, ‘अब तो तुम आ गए, अब बस यहीं रहो।’ उस शाम, सूरज डूबते समय, गाँव की पहाड़ी पर एक बेटा और माँ का दृश्य ऐसा था, जैसे धरती और आसमान का मिलन हो गया हो।
बलराज ने अपनी नौकरी छोड़ दी। परिवार को गाँव ला दिया। आज उसका बेटा अपने दादा-दादी की कहानियाँ सुनता है, और समझता है कि असली सफलता वह नहीं जो शहर में कमाई जाती है, बल्कि वह है जो प्रेम की कीमत पर बेची जाती है।
🪔 सीख: परदेस में कितना भी धन और सम्मान मिले, पर अपनों का प्रेम और विश्वास सर्वोच्च संपदा है। जीवन की सफलता का मापदंड केवल पैसा नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताया गया समय है।

