परदेसी बेटा
गांव के छोर पर बसे उस छोटे से घर में हर शाम एक रस्म थी। लक्ष्मी माता आंगन में बैठतीं, अपने हाथों से बुनी हुई वह बेरंग चादर ओढ़तीं, और सड़क की ओर देखतीं। उनकी आंखों में न जाने कितनी शामें घुल गई थीं।
राज उनका इकलौता बेटा था। तीन साल पहले, जब गांव के खेतों में अनाज पूरा न पड़ा, तो राज ने अपने पिता के कांपते हाथों से चिट्ठी ली और शहर चला गया। दिल्ली की भीड़ में खो गया वह नौजवान, जो कभी गांव के चौपाल पर बैठकर अपने बाबा की कहानियां सुनता था।
हर हफ्ते एक मनीऑर्डर आता था। कभी-कभी फोन से दो मिनट की बातचीत होती थी। लक्ष्मी का पति राम प्रताप हर बार वही सवाल पूछते थे—’बेटा, खा तो ठीक है? किराए का घर अच्छा है न? मौसम में सर्दी तो नहीं लग रही?’ राज हर बार हां भरता था, लेकिन उसकी आवाज़ में कोई और बात होती थी। एक दूरी। एक अपनापन खो गया।
इस बार तीन महीने हो गए—कोई खत नहीं, कोई फोन नहीं। लक्ष्मी रात भर जागतीं, सड़क पर गाड़ियों की आवाज़ सुनतीं, और सोचतीं—क्या कोई अनहोनी हो गई? राम प्रताप ने पड़ोसियों से पूछा, लेकिन किसी को कुछ पता न था। गांव के चौपाल पर लोग कहने लगे—’शहर में बस ऐसा ही होता है। बेटे भूल जाते हैं गांव को।’
लक्ष्मी को यह बातें तीर की तरह चुभतीं। वह अपनी पुरानी तस्वीरें निकालतीं—वह राज, जो बचपन में माता की साड़ी पकड़कर चलता था। उसकी हंसी कहां चली गई?
एक रविवार को, जब सूरज ढलने को था और आंगन की मिट्टी सोने की तरह चमक रही थी, तभी एक टैक्सी गांव की पगडंडी पर आकर रुकी। राज उतरा—दाढ़ी बढ़ी हुई, चेहरा थका-हारा, लेकिन आंखों में पानी था।
लक्ष्मी ने अपनी बेटी को पहचाना भी न पाया। वह सोचने लगीं—यह कौन है? फिर राज ने कहा, ‘माता…’ और वह दो शब्द ही काफी थे। लक्ष्मी की ज़िंदगी की सारी शामें एक पल में हल्की हो गईं।
उस रात पूरा गांव पता न भी नहीं चला कि परदेसी बेटा लौट आया था। क्योंकि लक्ष्मी के घर में केवल प्रेम गूंजा—माता के आंचल में, बेटे की रुलाई में, और पिता की गुप्त खुशी में। राज का हर कदम, हर सांस उसी मिट्टी को छू रहा था जहां उसकी जड़ें थीं।
अगली सुबह जब राज ने अपनी माता को आंगन में, सूर्य की पहली किरणों में, अपनी पुरानी चादर ओढ़े हुए देखा, तो समझ गया—शहर की सभी कमाई इन आंसुओं के बराबर नहीं थी। बेटा घर लौट आया था। और घर, फिर से घर बन गया था।
🪔 सीख: परदेस में चाहे कितना भी धन कमाओ, माता-पिता का प्रेम और अपनी जड़ों से जुड़ाव ही असली दौलत है। संबंधों की कीमत हमेशा याद रखनी चाहिए।


