कुएं के पास की यादें
गांव के चौमुखे चौराहे पर जहां पीपल का पेड़ था, वहीं से सटा हुआ था वह पुराना कुआं—गांव की धड़कन, जीवन की कहानी। राजू बारह साल का था जब उसके दादा ने उसे पहली बार उस कुएं के किनारे बैठकर गांव की बातें सुनाई थीं। दादा जी की सफेद दाढ़ी, उनकी खाकी धोती और तन पर लपेटी हुई पुरानी शाल—सब कुछ उसे आज भी याद है।
कुए के पास ही हर शाम को गांव की चौपाल लगती थी। मिट्टी के चबूतरे पर बैठे बुजुर्ग, किसान और नई पीढ़ी के लड़के खेतों की बातें करते थे, गांव की समस्याओं पर चर्चा करते थे। राजू अपने चचा के साथ वहां बैठता और चुप रहकर सब कुछ सुनता था। लेकिन असली मजा तो दोपहर का था जब स्कूल से लौटकर वह और उसके दोस्त कुएं के पास खेलते थे।
कुआं एक खेल का मैदान था—’गल्ली डंडा’, ‘पिट्ठू’ और ‘रस्सी कूद’। उस समय का कोई मोबाइल नहीं, कोई डिजिटल स्क्रीन नहीं। सिर्फ धूल, हंसी, दोस्ती और भोलापन था। गर्मी की दोपहर में जब धूप तेज होती, तो सब बच्चे कुएं के पास छाया में बैठकर पानी पीते। वह ठंडा पानी, लकड़ी की मोटी जरनी से निकाला गया पानी, जिसका स्वाद आज कहीं नहीं मिलता। राजू की दादा वहां पहुंच जाती और सब बच्चों को मिठाई खिलाती—गुड़ और बेसन के लड्डू।
फसल काटने के दिनों में कुएं के पास की रौनक दूनी हो जाती थी। महिलाएं पानी भरतीं, गीत गातीं। उनके कंठ से निकले राग—’आओ री साखी, भरो मेरी बाल्टी’—गांव की हवा में गूंजते थे। बरसात आती तो कुआं खुशी से उफनने लगता था और बच्चों की खुशी की सीमा नहीं रहती। राजू की मां उसे रोक लगाती कि कहीं पानी में न गिर जाए, पर वह तो कुएं की सीढ़ियों पर बैठकर पत्तियों को तैराती रहता।
साल दर साल गुजरे। राजू बड़ा हुआ, शहर चला गया। नौकरी की, घर बसाया। लेकिन हर बार जब वह गांव लौटता, सबसे पहले उस कुएं के पास ही जाता। कुआं अब पुराना और टूटा-फूटा था, पर राजू की यादें उसे नया बना देती थीं। वह उसी पत्थर पर बैठता जहां दादा जी बैठा करते थे, और महसूस करता कि गांव की वह दुनिया उसके अंदर जीवित है—कभी मिट नहीं सकती। कुआं सिर्फ पानी का स्रोत नहीं था, वह उसके बचपन, दोस्ती और सरलता का प्रतीक था।
🪔 सीख: गांव की सरल और ईमानदार जिंदगी, खेल-कूद के दिन और परिवार के साथ बिताए गए पल हमारे जीवन का सबसे कीमती खजाना होते हैं। भले ही हम आगे बढ़ जाएं और शहर चले जाएं, पर अपनी जड़ों को न भूलें, क्योंकि वही हमारी पहचान और शक्ति है।






