बिहार के एक छोटे से गांव में एक पुराना कुआं था। उसकी ईंटें समय के साथ लाल-भूरी हो गई थीं, लेकिन उसका दिल अभी भी जवान था। यह कुआं गांव की आत्मा माना जाता था। हर सुबह महिलाएं यहां पानी भरने आतीं, और साथ ही अपनी-अपनी बातें भी। दोपहर में बच्चों की हंसी-खिलखिलाहट इसके चारों ओर गूंजती थी।
नौ साल का रमेश इसी गांव में रहता था। उसके दादा उसे हर शाम कुएं के पास ले जाते थे। वहां चौपाल पर बैठे बुजुर्ग अपनी पुरानी बातें सुनाते थे। रमेश अपने दादा की गोद में बैठ कर उन्हें सुनता था। दादा कहते थे, ‘बेटा, इस कुएं ने हमारे सब पूर्वजों को पानी पिलाया है। यह हमारा इतिहास है।’
गर्मी की छुट्टियों में रमेश के सभी साथी कुएं के पास खेलने आते थे। वे डुग्गी-डुग्गी खेलते, लकड़ी के डंडों से पत्थर मारते, और गिल्ली-डंडा खेलते थे। कुएं के ठंडे पानी में कपड़े धोते हुए बड़ी लड़कियां उन्हें चिढ़ाती थीं। पर रमेश को इस सब में एक अजीब शांति मिलती थी। यह पल कहीं कीमती थे।
साल बीतते गए। रमेश शहर चला गया। नौकरी की, घर बसा लिया। लेकिन हर बारिश में उसे वो गांव याद आता था। वो कुआं, वो चौपाल, वो खेल, वो दादा की गोद… सब कुछ। वह सोचता था कि गांव कैसा होगा अब?
बीस साल बाद जब वह गांव लौटा, तो कुआं सूख गया था। उसके चारों ओर कंक्रीट की दीवारें खड़ी हो गई थीं। चौपाल अब नहीं थी। बुजुर्गों की आवाजें चुप हो गई थीं। गांव के लोग अब नल के पानी से खुश हो गए थे। पर रमेश को लगा कि कुछ खो गया है। कुछ ऐसा जो पानी से ज्यादा कीमती था।
उसने उस कुएं को फिर से खोदने का निर्णय लिया। गांव के लोगों ने मजाक उड़ाया, पर रमेश अपने निर्णय पर डटा रहा। महीनों की मेहनत के बाद कुआं फिर से जीवंत हो उठा। उसके चारों ओर फिर से छोटी चौपाल बनी। बुजुर्ग वहां बैठने लगे। बच्चों की हंसी फिर सुनाई देने लगी।
रमेश समझ गया कि विकास जरूरी है, पर जड़ों को भूलना नहीं चाहिए। वह कुआं सिर्फ पानी का स्रोत नहीं था। वह एक समय था, एक भावना थी, एक परिवार था। उस दिन से उसने हर गर्मी की छुट्टी अपने गांव में ही बितानी शुरू कर दी।
🪔 सीख: विकास और परंपरा का संतुलन ही सच्ची उन्नति है। अपनी जड़ों से जुड़े रहने में ही असली ताकत निहित है।
