उस साल की गर्मी असहनीय थी। गांव के कुएं सूख गए थे, धरती की दरारें गहरी हो गई थीं, और आकाश तांबे की तरह तपने लगा था। बुजुर्ग गांववासी कहते थे कि मोर नहीं आया इस बार, तो बारिश भी नहीं आएगी। गांव के बच्चों को इस बात का कोई डर नहीं था, पर उन्हें मोर को देखने की बेहद चाह थी।
जून की शाम को जब आसमान में पहली गड़गड़ाहट हुई, गांव के सभी बच्चे—राज, प्रिया, छोटू और गीता—अपने घरों से भाग निकले। पुरानी बरगद के पेड़ के पास इकट्ठा होकर वे बादलों को देख रहे थे। तभी एक चमकीली चीज़ उनकी नज़रों में पड़ी। यह तो एक मोर था! नीले रंग का, लंबी गर्दन वाला, और सबसे सुंदर पूंछ जिसे उन्होंने कभी देखा था।
मोर मानो जानता था कि बारिश आने वाली है। पहली बूंद गिरते ही उसने अपनी पूंछ खोली। हरी-नीली, सुनहरी और मोतियों जैसी सफेद पंखों की बारिश उसके शरीर से बिखरने लगी। बच्चों की चीख निकल गई—’देखो! देखो!’
मोर धीरे-धीरे घूमने लगा, और जैसे-जैसे बारिश बढ़ने लगी, वैसे-वैसे उसके कदमों का नृत्य भी तीव्र होता गया। उसके डैने हवा में लहराने लगे, जैसे वह बारिश का स्वागत कर रहा हो। बाजरे के खेत के किनारे, पुरानी पत्थर की दीवार के पास, मिट्टी की खुशबू उड़ने लगी। मोर का नीला शरीर बारिश की बूंदों में चमकने लगा, जैसे कोई ज़िंदा रत्न नाच रहा हो।
छोटू दौड़कर बरगद के पेड़ के नीचे खड़ा हो गया, प्रिया के हाथ राज ने पकड़ लिए। गीता तो सिर्फ खड़ी होकर देख रही थी, उसकी आंखों में आश्चर्य और खुशी का मिश्रण था। मोर का नृत्य रुकने का नाम नहीं ले रहा था। वह कभी दाएं मुड़ता, कभी बाएं, कभी अपनी पूंछ ऊपर उठाता, और कभी उसे घुमाता। बारिश की हर बूंद उसके पंखों पर गिरती और प्रकाश के इंद्रधनुष में बदल जाती।
जब बारिश रुक गई, मोर भी धीरे-धीरे शांत हो गया। उसने एक बार बच्चों की ओर देखा, जैसे कह रहा हो कि वह सिर्फ उनके लिए ही नृत्य किया था। फिर वह खेतों की ओर चला गया, ज़मीन को अपने पैरों से छूते हुए, जो अब नमी से भर गई थी।
उस रात गांव में खुशी की बारिश हुई। हर घर में पानी का घड़ा भर गया, धरती को नई जान मिल गई, और बच्चों के दिलों में मोर का नृत्य हमेशा के लिए बस गया। वे कहते थे कि असली बारिश मोर के नृत्य से ही आती है। और हर साल, जब पहली गड़गड़ाहट होती, बच्चे बरगद के पेड़ के पास दौड़े चले जाते थे, उस नीले सपने को फिर से देखने के लिए।
🪔 सीख: प्रकृति के साथ का हर पल एक उपहार है। खुशियाँ छोटी चीज़ों में छिपी होती हैं, और बचपन की आश्चर्य की भावना ही जीवन को सार्थक बनाती है।



