कुम्हार का चाक

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गांव के सिरे पर एक छोटी सी झोपड़ी थी, जहां रोज़ सुबह मिट्टी की खुशबू उड़ती थी। वहां रहते थे बुज़ुर्ग कुम्हार दादा, जिनके हाथों में तीस साल का अनुभव था। उनका बेटा राजू हर दिन दादा को चाक पर काम करते देखता, लेकिन कभी सीखने की कोशिश नहीं करता। राजू को लगता था कि बर्तन बनाना आसान काम है, बस मिट्टी को घुमा दो और हो गया।

एक दिन राजू ने दादा से कहा, ‘दादा, मुझे भी सिखा दो। मैं तो अभी से ही बर्तन बना सकता हूं।’ दादा मुस्कुराए और कहा, ‘ठीक है, कल सुबह आ जाना।’ अगली सुबह राजू समय पर चाक के पास पहुंच गया। दादा ने उसे पहले मिट्टी तैयार करने को कहा। राजू ने सोचा यह तो बहुत आसान है, लेकिन मिट्टी को हाथों से दिन भर मसलना, पानी मिलाना, इसे बार-बार घुमाना—यह काम इतना मेहनत भरा था कि राजू की कमर टूटने लगी।

दूसरे दिन दादा ने कहा, ‘अब चाक पर बैठ।’ राजू उत्साहित हो गया। दादा ने मिट्टी को चाक पर रखा, पैर से चाक को घुमाने लगे। उनके बुज़ुर्ग हाथ मिट्टी पर सॉफ़्ट हाथों से दबने लगे। मिट्टी धीरे-धीरे एक गोल आकार लेने लगी। ‘देख राजू,’ दादा बोले, ‘चाक को घुमाते हुए सब्र रखना पड़ता है। जल्दबाज़ी मत कर। मिट्टी को अपने दिल की भाषा समझ।’

राजू ने दादा की नक़ल करने की कोशिश की, लेकिन उसका हाथ कांपता था और मिट्टी टेढ़ी हो जाती थी। कई बर्तन बीच में ही टूट गए। हर बार टूटते देख राजू का मन टूट जाता था। पर दादा कभी डांटते नहीं थे। वह सिर्फ कहते, ‘फिर से कोशिश कर। हर बर्तन तुम्हें सिखाएगा।’

महीनों गुजर गए। राजू के हाथ मिट्टी को समझने लगे। अब उसके पैर चाक को सही गति से घुमाते थे, और उसके हाथ मिट्टी को प्यार से तराशते थे। एक दिन जब दादा ने राजू के बनाए बर्तन को देखा, तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए। ‘बेटा, अब तुम समझ गए हो,’ दादा ने कहा, ‘सब्र और मेहनत ही असली कला है।’

अब गांव में राजू के बर्तन उतने ही मशहूर हैं जितने उसके दादा के। हर किसी को पता है कि ये बर्तन प्यार और सब्र से बनाए गए हैं। राजू को अब समझ आ गया कि चाक पर बैठना सिर्फ हुनर नहीं, यह एक ध्यान है, एक मेडिटेशन है। और मिट्टी को तराशना सिर्फ काम नहीं, यह जीवन सीखना है।


🪔 सीख: सब्र, मेहनत और प्रेम से किया गया काम हमेशा सफल होता है। जल्दबाज़ी और अहंकार बर्बादी का कारण बनते हैं। असली कला सिर्फ हुनर नहीं, बल्कि दिल से काम करना है।

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