मोर की बारिश का नृत्य
गांव के चिरैया टोले में जब मई की तेज धूप से सब कुछ तप जाता था, तब सब बस एक ही चीज़ का इंतज़ार करते थे—बारिश। उस साल गर्मी इतनी भयंकर थी कि कुआं भी आधा सूख गया था। खेतों में दरारें पड़ गई थीं और किसान चिंतित रहते थे।
गांव के बच्चों में सबसे बड़ा था नौ साल का राज, जिसके पास हमेशा कोई न कोई सपना रहता था। उस दिन जब अंबर में काले-भुरे बादल मंडराने लगे, तो राज ने अपने साथियों को पुकारा—छोटी रीता, गोपी और मुन्नी को। सब बस्ती के पीछे बाग की ओर दौड़ गए, जहां आम और नीम के पेड़ों की घनी छाया थी।
हवा बदलने लगी थी। गर्म, सूखी हवा ठंडी और नम होने लगी थी। पहली बूंदें गिरीं। फिर बारिश शुरू हुई—धीरे-धीरे, फिर तेज़। बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई दी। और तभी, उन पेड़ों के बीच एक अद्भुत दृश्य दिखा।
एक नीला-हरा मोर, अपने पंखों को खोलता हुआ, बारिश में नाचने लगा। उसका मुकुट ऊपर को उठा हुआ था, और उसकी लंबी पूंछ बारिश की बूंदों में चमकने लगी। उसके पंखों पर हजारों आंखें नज़र आ रही थीं, जैसे वह हर बूंद को देख रहा हो। मोर ने अपने पैरों पर एक के बाद एक कदम रखे, इतनी सुंदरता से कि बच्चों की सांसें रुक गईं।
राज की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। रीता ने चिल्लाकर कहा, ‘देखो, देखो! वह बारिश के लिए नाच रहा है!’ गोपी हाथ जोड़ गया, मानो कोई देवता नाच रहा हो। मुन्नी सिर्फ देखती रही, मोर को मुखड़े पर खुशी देख रही थी।
मोर पांच मिनट तक नाचता रहा। बारिश तेज़ होती गई, पर वह रुका नहीं। उसके नीले-हरे रंग और सुनहरी पूंछ बारिश की बूंदों में चमचमाती रही। आखिरकार, जब बारिश और भी तेज़ हो गई, तो वह एक पेड़ की गहरी छाया में चला गया, पर अपने पंखों को एक बार और खोल कर, जैसे बच्चों को धन्यवाद दे।
बच्चे घर लौटे। उन्होंने यह किस्सा सब को बताया—दादी-दादा को, माता-पिता को, पड़ोसियों को। गांव में बस यही बात रहने लगी कि इस बार मोर ने ही बारिश बुलाई है। खेतों में फसल हरी-भरी हो गई। कुआं फिर से भर गया। और हर मानसून में, जब पहली बारिश आती, तो बच्चे उसी बाग की ओर भागते, एक बार फिर से उस नीले मोर के नृत्य को देखने की उम्मीद में।
🪔 सीख: प्रकृति की सुंदरता में आनंद खोजो। मानसून, वर्षा और प्रकृति के जीव-जंतु हमें सिखाते हैं कि जीवन के कठिन समय में भी खुशी मनाई जा सकती है। बचपन की खुशियां सबसे सच्ची होती हैं।



