ढोल की धड़कन और दादा का सपना
गांव के कोने में बसे तिवारी परिवार की हवेली में आज तैयारी का शोर मचा था। दाढ़ी वाले दादा जी अपनी खाट पर बैठे, उन्हीं की नज़र बार-बार दरवाज़े की ओर जाती थी। उनका एकमात्र पोता राज आज की बारात में घोड़ी पर चढ़ने वाला था। दादा जी ने पचास साल पहले भी ऐसी ही बारात देखी थी, लेकिन आज की बात निराली थी।
“दादा, आप भी तो आएंगे न? ढोल की आवाज़ सुनेंगे?” राज बार-बार पूछता था। दादा जी की आंखें नम हो जाती थीं। वह चुप रहते थे, पर उनके भीतर एक दर्द था। दस साल की उम्र में उन्हें गांव के ज़मींदार का बेटा कहकर बुला लिया गया था—उनकी बारात निकालने के लिए नहीं, बल्कि ढोल बजाने के लिए। उन्हें ढोल की कला सिखाई गई थी, न कि शादी का अधिकार दिया गया था।
बारात निकलने का समय हुआ। गांव की गलियों में बैंड-बाजे बज उठे। राज सफ़ेद घोड़ी पर रेशमी शेरवानी पहने बैठा था। सजे-धजे रिश्तेदारों का जुलूस चल निकला। तभी दादा जी अपनी खाट से उठे—कमज़ोर कदमों से, पर दृढ़ संकल्प के साथ। आंगन में वह सीढ़ियों के पास बैठ गए, जहां से बारात का रंग दिखाई देता था।
जैसे ही ढोल की पहली थाप बजी, दादा जी की अंगुलियां अपने आप हिल गईं। उनके होंठों से लयबद्ध सुर निकल आए। वह बहुत पुरानी स्मृति में चली गए—उस दिन, जब उन्होंने पहली बारात के लिए ढोल बजाया था। कितना अकेला था वह राज्य, कितना खोया हुआ।
अचानक, ढोल बजाने वाले खुद गांव के बुजुर्ग ठाकुर आए और दादा जी के पैर छू गए। “बाबा जी, आपकी बारात आज पूरी हो रही है। राज आपका पोता है—आपकी वंश परंपरा को आगे ले जाने वाला। लड़की वाले ने कहा है कि शादी की परंपरा के अनुसार, राज को दादा जी का आशीर्वाद चाहिए, और दादा जी को ढोल बजाना चाहिए।”
दादा जी के हाथ कांपने लगे। उन्होंने सिर हिलाया—न हां में, न न में। पर तभी राज दौड़ता हुआ आया, घोड़ी से उतर कर दादा के पैर चूमे। “दादा, कृपया आइए। आप ढोल बजाइए। गांव सुनेगा कि राज के दादा कितने महान ढोल वादक हैं।”
दादा जी की आंखों से आंसू बहने लगे। पचास साल की तकलीफ़, उपेक्षा और अकेलेपन का सारा दर्द उन आंसुओं में समा गया। उन्होंने राज को गले से लगा लिया।
शाम को, जब बारात दुल्हन को लेकर वापस आ रही थी, तो दादा जी ढोल बजा रहे थे—उनके हाथों में वही लय, वही जादू जो कभी किसी और का सपना तोड़ने के लिए बजता था, अब अपने पोते के सुख का त्योहार बन गया था। गांव की महिलाएं नाच रही थीं, गलियां गीत से गूंज रही थीं, और दादा जी की हर थाप में नई जिंदगी, नई आशा, और आखिरकार—अपनी बारात का सपना पूरा हो रहा था।
🪔 सीख: जीवन के किसी भी चरण में दर्द हो, प्रेम और परिवार उसे आशीर्वाद में बदल सकते हैं। अतीत को भूलना नहीं, बल्कि उससे सीखकर भविष्य को सुंदर बनाना ही सच्चा जीवन है।


