ढोल की धड़कन और दिल की सदा

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गांव के बाहर नीम के पेड़ों की पंक्ति में सजी सफेद घोड़ी को देखकर लड़कों का समूह चीख-चिल्लाने लगा। लाल-सोने के काठी वाली वह घोड़ी इस बार किसी राजा के लिए नहीं, बल्कि रामू के लिए थी — वही रामू जो पिछली गर्मियों में गांव का सबसे गरीब लड़का माना जाता था।

रामू का बाप दिहाड़ी मजदूर था, और पूरा गांव जानता था कि उसके घर में दो मुट्ठी अनाज के लिए भी संघर्ष होता रहता था। लेकिन गत वर्ष जब गांव में सूखा पड़ा, तब रामू ने रात-दिन परिश्रम करके जो पेड़-पौधे लगाए थे, वे इस बार फल-फूल से लद गए। महाराज सिंह को जब पता चला कि यह लड़का अपने मां-बाप को इस तरह संभाल रहा है, तो उन्होंने अपनी बेटी लक्ष्मी का हाथ रामू को देने का निर्णय ले लिया। गांव में यह खबर बिजली की तरह फैल गई।

अब बारात निकलने का दिन आ गया था। रामू के घर के सामने जो एक कमरे की झोपड़ी थी, वहां से सुबह तड़के ही ढोल की आवाज गूंजने लगी। ढोलक को बजाने वाला शिवा पहलवान, जो कभी महत्वपूर्ण शादियों में ही बुलाया जाता था, इस बार पहली बार किसी गरीब घर की बारात में था। शिवा को रामू की मां ने तीन महीने पहले ही तय कर दिया था, और हर दिन उसे खीर-पूरी खिलाई थी।

दोपहर को जब बारात निकली, तो पूरा गांव सड़क पर उतर आया। सफेद घोड़ी पर बैठा रामू अपनी नई धोती-कुर्ते में इतना सुंदर लग रहा था कि पहचानना मुश्किल हो गया। उसके सिर पर सोने-चांदी की सीमा वाली सेहरा टंगी थी, और गालों पर खुशी का रंग खिल उठा था। ढोल की थाप सुनते ही बैंड वाले अपनी तुरहियां बजाने लगे। ‘धीम-धाप, धीम-धाप’ — यह आवाज गांव के हर कोने तक पहुंच रही थी।

रामू की मां, जिसका नाम गंगा बाई था, घर के आंगन में बैठी हुई रो रही थी। न तो खुशी के आंसू थे, न दुख के — बल्कि वह जीवन भर के संघर्ष का फल देख रही थी। रामू के बाप ने उसका हाथ पकड़ा और कहा, ‘देख, बहुत दिन से ढोल की यह आवाज सुनने का सपना देख रहे थे। आज हमारे बेटे के लिए बज रहा है।’ गंगा बाई ने अपने आंचल से चेहरा पोंछा और बाहर निकल गईं।

बारात चलते हुए जब गांव के चौराहे पर पहुंची, तो दूर के गांव से आने वाली कन्या की बारात के साथ मिल गई। दोनों ओर से ढोल बज रहे थे। रामू और लक्ष्मी की घोड़ियां एक-दूसरे के पास आईं। इस पल में ढोल की धड़कन और दिल की सदा एक हो गईं। पूरे गांव के लोगों ने देखा कि कैसे इस गरीब लड़के की मेहनत को समाज ने स्वीकार किया। ढोल की हर थाप में न केवल संगीत था, बल्कि बदलाव की भी कथा थी।

शाम को जब दूल्हे-दुल्हन मंडप के नीचे बैठे, तब ढोल की आवाज रुक गई। लेकिन हर किसी के कान में वह ताल गूंज रही थी — ढीम-धीम-धाप। यह सिर्फ एक शादी नहीं थी, यह एक संदेश था कि मेहनत और ईमानदारी को समाज कभी नहीं भूलता।


🪔 सीख: मेहनत और सच्चरित्र की कीमत समाज में सबसे ऊंची होती है। गरीबी कोई बाधा नहीं है जब दिल में साहस और हाथों में कौशल हो।

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