मेले का जादूगर और दादी की पहचान

हर साल की तरह इस बार भी गांव में बसंत मेला लगा था। रंग-बिरंगी झूलों, मिठाई की दुकानों और भीड़ की खुशबू पूरे गांव में फैल गई थी। लेकिन इस साल कुछ अलग था। एक रहस्यमयी जादूगर आया था जो बस तीन दिन के लिए रुकना चाहता था।

नौ साल का राजू अपनी दादी दांती माता के साथ मेले में घुसा। दांती माता बहुत बुजुर्ग थीं, सफेद साड़ी पहनती थीं और हमेशा खुश रहती थीं। जैसे ही उन्होंने जादूगर का तम्बू देखा, राजू की आंखें चमक गईं। तम्बू के बाहर लिखा था—’काला जादूगर: शताब्दी का सबसे बड़ा तमाशा।’

पहली शाम को जब जादूगर अपना खेल दिखाने लगा, तो पूरा गांव मंत्रमुग्ध हो गया। वह एक युवा, लंबा आदमी था, काली पगड़ी पहने हुए, उसके हाथों में जादू की छड़ी थी। उसने एक लड़की को बॉक्स में बंद किया और गायब कर दिया, फिर तालाब से निकाल दिया। भीड़ तालिया बजाने लगी। लेकिन दांती माता चुप रहीं। राजू ने देखा कि उनकी दादी बहुत ध्यान से जादूगर को देख रही हैं।

दूसरी रात को राजू ने दादी से पूछा, ‘दादी, आप खुश क्यों नहीं हैं? सब को जादूगर का जादू पसंद आया।’ दांती माता ने राजू को गोद में बिठाया और कहा, ‘बेटा, यह सच का जादू नहीं है। असली जादू तो होता है सच्चाई का।’

तीसरे दिन, जब जादूगर अपना सबसे बड़ा खेल दिखाने वाला था, तब दांती माता अचानक खड़ी हो गईं। उन्होंने जादूगर को पहचान लिया। वह पचास साल पहले उनका बेटा था, जिसे वह खोजती रही थीं। उस समय एक दुर्घटना में राजू का दादा मर गया था, और उनका बेटा गांव से चला गया था, सोचते हुए कि उसकी मां उसे माफ नहीं करेगी।

जब दांती माता ने मंच पर चढ़कर उसे गले लगाया, तो पूरा मेला रुक गया। जादूगर के आंसू बह गए। वह अपनी माता को पहचान गया। ‘माता, मुझे माफ कर दो,’ वह रोया। दांती माता हंसते हुए रोईं। ‘बेटा, असली जादू तो यही है कि आत्मा एक-दूसरे को पहचान लेती है, चाहे कितना भी समय बीत जाए।’

उस दिन के बाद जादूगर गांव में ही रह गया। उसने बताया कि वह सालों भर जादू सीखता रहा, लेकिन अपनी मां को खोजता रहा। दांती माता ने उसे माफ कर दिया, और राजू को सीख मिल गई कि असली जादू प्रेम और सच्चाई का होता है, न कि छल-प्रपंच का।


🪔 सीख: असली जादू प्रेम, सच्चाई और क्षमा का होता है। समय कितना भी बीत जाए, सच्चे रिश्ते हमेशा एक-दूसरे को पहचान लेते हैं। जीवन के सबसे बड़े तमाशे हैं हमारे अपने लोग और हमारे बीच का प्रेम।

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