छोटे गांव बसंतपुर में हर साल वसंत पंचमी पर मेला लगता था। इस बार मेले में कुछ अलग ही था। एक रहस्यमयी जादूगर आया था, जिसका नाम किसी को पता नहीं था। उसके पास एक पुरानी पिटारी थी और एक सांप का टोकरा। लोग सोचते थे कि वह साधारण नट है, लेकिन उसके तमाशे देखने के बाद सब कुछ बदल गया।
गांव के जमींदार का पोता राज था, जो पिछले छह महीनों से बीमार था। बुखार तो उतर गया था, लेकिन उसकी मुस्कुराहट कहीं खो गई थी। वह चुप-चुप बैठा रहता, कभी हंसता नहीं। उसकी दादी माता लक्ष्मी इससे बहुत परेशान थीं। मेले में जब जादूगर के बारे में सुना, तो उन्होंने राज को ले जाने का फैसला किया।
जादूगर का तंबू मेले के सबसे दूर कोने में था। वहां रंग-बिरंगी झालरें लगी थीं और दीये जल रहे थे। जब राज अंदर गया, तो जादूगर ने उसकी आंखों में देखा और मुस्कुरा दिया। फिर उसने अपनी पिटारी खोली। सफेद कबूतर उड़े, लाल फूल बरसे, और हवा में संगीत गूंजने लगा। लेकिन यह सब दिखावा नहीं था।
जादूगर ने राज से कहा, ‘बेटा, तुम्हारी मुस्कुराहट यहीं है।’ फिर उसने खाली हाथ को राज के सामने खोला और वहां से एक छोटा सा कागज निकला। उस पर राज का बचपन का चित्र था—वह अपने पिता के साथ खेत में खेल रहा था। राज की आंखें भर आईं। उसे याद आया कि उसके पिता की मृत्यु के बाद उसने हंसना भूल गया था।
जादूगर ने कहा, ‘दर्द को भूलना नहीं चाहिए, पर उसमें डूब जाना भी नहीं चाहिए। जो चले गए उन्हें याद करो, लेकिन जो रह गए उन्हें प्रेम दो। तुम्हारी दादी हर दिन तुम्हें खीर बनाती हैं, तुम्हारी दाई तुम्हारे लिए गीत गाती है। उनकी मुस्कुराहट की कीमत समझो।’
उसी पल राज की मुस्कुराहट वापस आ गई। जब वह दादी के पास गया, तो पहली बार छह महीनों में उसने सच में हंसा। दादी माता के सारे दर्द गायब हो गए। मेले के बाकी सभी लोग भी राज को हंसते देख रोने लगे।
अगले दिन जब गांव के लोगों ने जादूगर का तंबू ढूंढा, तो वह खाली था। सिर्फ राख और कुछ सूखे फूल रह गए थे। कुछ को लगा कि वह देवता था, कुछ को लगा कि वह साधारण इंसान था। लेकिन गांव भर को पता था कि उस जादूगर ने जो जादू किया, वह सच्चा था।
🪔 सीख: जीवन के दर्द को याद रखना ज़रूरी है, पर उसे ढोना नहीं। अपने प्रियजनों के प्रेम को पहचानो और उन्हें वो खुशियां दो जो उन्हें चाहिए।


