चोर का पछतावा

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गांव के किनारे एक छोटी सी झोपड़ी में रामू रहता था। उसके पिता की मृत्यु के बाद से घर में गरीबी ने डेरा डाल दिया था। रामू की माँ दिन भर मजदूरी करती थी, फिर भी पेट भर खाना नहीं मिलता था। सोलह साल का रामू पढ़ना चाहता था, पर स्कूल की फीस देने की क्षमता घर में नहीं थी।

गांव के जमींदार ठाकुर साहब के घर में हर महीने अनाज और रुपये का भंडार रहता था। रामू के मन में एक बुरा विचार आया—क्या वह रात में ठाकुर साहब के घर से कुछ रुपये चुरा न ले? शायद इससे घर की आर्थिक स्थिति सुधर जाए। रामू के मन में यह विचार कई दिनों तक उथल-पुथल मचाता रहा।

एक चाँदनी रात को, जब पूरा गांव सो गया, रामू ने ठाकुर साहब के घर में घुसने का साहस किया। उसने खिड़की से अंदर घुसकर एक कोने से सौ रुपये चुरा लिए। लेकिन जैसे ही वह घर से निकलने लगा, उसकी नज़र ठाकुर साहब के पोते—छोटे बालक गोपाल के चेहरे पर पड़ी, जो सो रहा था। गोपाल रामू का ही उम्र का साथी था और स्कूल में भी उसके साथ पढ़ता था।

रामू के दिल में कुछ हलचल हुई। उसने गोपाल के सोते हुए चेहरे को देर तक देखा। उसे अपना काम गलत लगने लगा। रुपये की खुशी मिट गई और पछतावे का बोझ बढ़ने लगा।

अगली सुबह, जब चोरी का पता चल गया, तो पूरा गांव खलबली में आ गया। ठाकुर साहब को क्रोध आ गया। लेकिन दोपहर को, जब रामू ठाकुर साहब के दरबार में खुद को फाँसी देने के लिए प्रस्तुत हो गया और उसने पूरी कहानी सुनाई, तो सब को आश्चर्य हुआ। रामू की आँखें आँसुओं से भरी थीं।

ठाकुर साहब ने रामू को समझाया—’गरीबी में चोरी करना आसान है, पर चोरी करने के बाद उसे स्वीकार करना बहुत मुश्किल है। तुमने जो किया वह गलत था, लेकिन तुम्हारा पछतावा और साहस ही तुम्हें ईमानदार आदमी बनाता है।’ ठाकुर साहब ने रामू को स्कूल में दाखिल करवा दिया और महीने का कुछ काम भी दे दिया, ताकि वह ईमानदारी के साथ अपने पैरों पर खड़ा हो सके।

रामू की माँ को जब यह सब पता चला, तो वह रो पड़ी—न खुशी के आँसू, न दुःख के, बल्कि गर्व के आँसू। उसका बेटा गलती को स्वीकार कर चुका था और उसकी ईमानदारी ही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति थी।

आगे चलकर रामू एक सफल शिक्षक बना और गांव के सभी गरीब बच्चों को पढ़ाता था। वह हमेशा कहता था कि ईमानदारी ही असली दौलत है और कभी गरीबी भी किसी को बुरे रास्ते पर नहीं ले जा सकती, अगर दिल में विचार हो।


🪔 सीख: गरीबी चाहे जितनी कठोर हो, ईमानदारी कभी नहीं खोई जानी चाहिए। गलती को स्वीकार करना और पछतावा करना ही असली बहादुरी है। पछतावा इंसान को सुधारता है और उसे अच्छा बनाता है।

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