चोर का पछतावा

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गांव के किनारे एक छोटी सी झोपड़ी में बालकृष्ण अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहता था। गरीबी ने उसे सताया था, लेकिन ईमानदारी उसके घर की संपत्ति थी। एक दिन बाज़ार से लौटते समय उसकी नज़र जमींदार के बेटे राज पर पड़ी, जो नए कपड़ों में घूम रहा था। उसके हाथ में एक सोने की अंगूठी चमक रही थी। बालकृष्ण के मन में लालच आ गया।

रात भर वह सो नहीं सका। उसकी माँ बीमार थी और दवाई के लिए पैसे नहीं थे। गांव के हकीम ने कहा था कि महंगी दवाई चाहिए। बालकृष्ण के मन में एक बुरा ख्याल आया—क्यों न वह राज की अंगूठी चोरी कर ले और दवाई खरीद ले?

तीन रातों का इंतज़ार करके, बालकृष्ण ने राज के घर में घुसने का फैसला किया। उस रात चाँद छिपा था। उसने पिछले दरवाज़े से घुसा और राज के कमरे में पहुंचा। अंगूठी उसकी तकिए के पास रखी थी। उसने सोच लिया—बस यह एक काम और पिछले कर्मों को भूल जाएगा। हाथ आगे बढ़ाया, पर तभी राज की माँ की मूर्ति पर उसकी नज़र पड़ी। उसके मुँह पर हल्की मुस्कान थी, जैसे वह कह रही हो—यह गलत है।

बालकृष्ण ने हाथ खींच लिया। उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। वह धीरे-धीरे पीछे हटा और घर लौट आया। सारी रात वह बिस्तर पर लेटा अपने आप से लड़ाई करता रहा।

अगली सुबह, बालकृष्ण ने अपनी माँ को सच बताया। उसकी माँ की आँखों में आँसू आ गए। उसने बेटे को गले से लगाया और कहा, ‘बेटा, तूने ईमानदारी को चुना। यह सोना की अंगूठी नहीं, बल्कि तेरा सच्चा चरित्र ही असली धन है।’

दोपहर को, बालकृष्ण पंचायत के सामने बैठ गया। गांव के सरपंच को उसने सब कुछ बता दिया। सरपंच चकित रह गए। उन्होंने बालकृष्ण के ईमान का सम्मान किया और राज के पिता को बुलवाया। जमींदार को जब सच पता चला, तो वह भी आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने स्वयं बालकृष्ण के घर जाकर उसकी माँ को सर्वश्रेष्ठ दवाई दी और गांव के स्कूल में बालकृष्ण को नौकरी दे दी।

गांव में एक कहावत बन गई—चोरी का विचार करना और उससे पीछे हटना, यह असली वीरता है। बालकृष्ण ने साबित कर दिया कि गरीबी कभी बुराई का बहाना नहीं बन सकती। ईमानदारी ही मनुष्य को सच्चा अमीर बनाती है।


🪔 सीख: पछतावा और ईमानदारी का रास्ता हर गलती को सुधार सकता है। भले ही गरीबी हमें कमजोर करे, लेकिन सच का साथ न छोड़ना ही असली ताकत है।

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