दादी की सुनहरी डिब्बी
गांव की उस पुरानी हवेली में जहां छत पर तारे दिखते थे, दादी माता अपनी पोती रीता को सोने के लिए तैयार करती थीं। रीता छः साल की थी, और रात भर सवाल पूछने की आदत थी। दादी ने उसे पलंग पर लिटाया और कहा, ‘बेटा, आज मैं तुम्हें अपनी सबसे प्रिय कहानी सुनाती हूं।’
बहुत साल पहले, गांव में एक लड़की थी जिसका नाम सीता था। वह बहुत गुस्से वाली थी। जरा सी बात पर चिल्ला देती, खिलौने फेंक देती, और सब से लड़ाई कर लेती। उसकी दादी उसे बहुत प्यार करती थीं, लेकिन चिंतित भी रहती थीं। एक दिन दादी ने सीता को बुलाया और एक पुरानी सुनहरी डिब्बी दी। डिब्बी में कोई खजाना नहीं था, सिर्फ चमकते हुए पत्थर और रंगीन मोती थे।
दादी ने कहा, ‘बेटा, हर बार जब तुम गुस्से में आओ, एक पत्थर निकालना। और जब तुम शांत हो जाओ, तो उसे वापस डालना। जिस दिन डिब्बी खाली हो जाए, तुम्हें अपना गुस्सा जीत जाना चाहिए।’ सीता को यह खेल पसंद आ गया। पहले दिन उसने पचास पत्थर निकाले! दूसरे दिन तीस। धीरे-धीरे, उसने महसूस किया कि डिब्बी को खाली देखना कितना अच्छा लगता है। जब भी वह गुस्से में आती, तो पहले दस सेकंड रुकती, फिर पत्थर निकालती।
महीनों बाद, डिब्बी लगभग खाली हो गई। सीता बदल गई थी। वह अब शांत, समझदारी भरी और दयालु लड़की बन गई थी। उसके माता-पिता को आश्चर्य हुआ। जब दादी ने कहा कि डिब्बी अब पूरी खाली हो गई, तो सीता को सबसे बड़ी खुशी हुई। उसकी दादी ने उसे गले लगाया और कहा, ‘बेटा, यह तो सिर्फ एक खेल नहीं था। तुमने सीखा कि क्रोध को नियंत्रित कैसे करते हैं।’
दादी रुकीं और रीता के माथे पर हाथ रखा। ‘इसी लिए मैंने यह कहानी तुम्हें सुनाई, प्रिय। क्योंकि तुम भी कभी-कभी गुस्से में आ जाती हो। याद रखो, हर बार जब तुम्हें गुस्सा आए, सोचो कि एक सुनहरी डिब्बी तुम्हारे पास है। और तुम्हारा काम है उसे खाली करना।’ रीता की आंखें बंद हो गईं, उसके होंठों पर मुस्कुराहट थी। दादी ने उसके सिर पर चुंबन किया और धीरे से कहानी का अंत सुनाया, ‘और सीता हमेशा खुश रही।’
🪔 सीख: गुस्से को नियंत्रित करना हर किसी को सीखना चाहिए। धीरज और अभ्यास से हम अपनी भावनाओं पर काबू पा सकते हैं। बचपन में सिखाए गए छोटे सबक पूरी ज़िंदगी काम आते हैं।






