दादी माँ की चाँदनी रात
गाँव के बाहरे एक पुरानी कच्ची हवेली में रहने वाली दादी माँ शाम को हमेशा छत पर बैठ जाती थीं। उनकी छोटी पोती रुचि हर रात उनके पास दौड़ी चली आती थी, एक कहानी सुनने के लिए। इस रात भी चाँद निकल आया था, पूरा और चमकदार, जैसे कोई विशाल चाँदी की थाली।
रुचि ने दादी की गोद में सिर रखा और पूछा, ‘दादी माँ, आप हमेशा कहती हो कि गाँव में हर चीज़ का अपना अर्थ है। तो इस चाँद का क्या अर्थ है?’ दादी माँ ने अपनी झुर्रीदार हथेली से पोती के बालों को सहलाया और मीठी आवाज़ में बोलीं।
‘बेटा, मुझे बताऊँ तो याद आता है, जब मेरी दादी मुझे यह कहानी सुनाती थीं। बहुत पुराने ज़माने में, इसी गाँव में एक लड़की थी जिसका नाम था लीला। वह बहुत गरीब परिवार से थी, पर उसका दिल सोने जितना पवित्र था। उसके घर में एक भी दीये का तेल नहीं था, इसलिए रात को वह अकेली चाँदनी में बैठकर अपने भाइयों को पढ़ाया करती थी।’
‘एक दिन गाँव के जमींदार का बेटा उसे पढ़ाते देखा। वह इतना प्रभावित हुआ कि उसने लीला के परिवार को घर दिलवा दिया। लेकिन जानते हो क्या, लीला ने जमींदार के बेटे से कहा, मेरी मदद मत करो। मैं अपने परिश्रम से अपना घर बनाऊँगी।’
‘और उसने ऐसा ही किया। उसने गाँव की लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया, और हर रात चाँदनी में बैठकर उन्हें शिक्षित करती रही। आज भी वह लड़कियाँ बड़ी हुईं, पढ़ी-लिखी बनीं, और गाँव को रोशनी दी।’
दादी माँ ने रुकते हुए चाँद की ओर इशारा किया। ‘इसलिए बेटा, यह चाँद हमें सिखाता है कि जब अपनी रोशनी से दूसरों को रास्ता दिखाते हो, तो तुम कभी अकेले नहीं होते। और सबसे बड़ी बात, अपना परिश्रम कभी हार मत मानो, चाहे संसार कितना भी अंधकारमय हो। जैसे लीला ने चाँदनी में पढ़ाई की, तुम भी अपनी मेहनत को कभी भूलो मत।’
रुचि के आँखें भारी हो गईं, पर उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कुराहट थी। दादी माँ ने उसे सीने से लगा लिया, और चाँद की चाँदनी उन दोनों को ढाँप गई। गाँव की रातें ऐसी ही थीं—सीखों से भरी, स्नेह से सजी।
🪔 सीख: जीवन की असली रोशनी परिश्रम, ईमानदारी और दूसरों की सेवा से आती है। कठिनाइयों में भी अपना संकल्प मत भूलो, और अपनी शक्ति से दूसरों को रास्ता दिखाना सबसे बड़ी सफलता है।






