गांव के उस पुराने मकान में जहां छत से सदियों पुरानी खपरैलें झलकती थीं, दादी माता अपनी पोती लता को रजाई में बिठाकर कहानी सुना रही थीं। बाहर सर्दियों की रात थी और खिड़की से हल्की-हल्की ठंडी हवा आ रही थी। दादी की झुर्रियों वाला चेहरा दीये की पीली रोशनी में और भी गर्माहट भरा लग रहा था।
“तुम जानती हो बेटा, जब मैं तुम्हारे जितनी छोटी थी, तो मेरी अपनी दादी ने मुझे एक सीख दी थी,” दादी ने अपनी गिनती अंगुली से लता के माथे पर प्यार से छुआ। “उस साल गांव में भयंकर सूखा पड़ा था। महीनों से बारिश नहीं हुई थी। सूरज इतना तेज़ था कि खेतों की मिट्टी फट जाती थी।”
“फिर क्या हुआ, दादी?” लता ने अपनी आंखें बड़ी करते हुए पूछा। दादी ने अपने हाथ में लता का छोटा सा हाथ ले लिया और कहानी आगे बढ़ी। “मेरी दादी हर सुबह कुएं के पास जाती थीं। वह पानी निकालते समय गीत गाती थीं और बाल्टियों को प्यार से रगड़ती थीं। मैं सोचती थी, दादी यह क्या करती हैं? एक दिन मैंने पूछा तो वह हंसी।”
दादी ने लता की पोनी पकड़ी और आगे कहा, “उन्होंने कहा – ‘बेटा, जब तुम उस चीज़ की कद्र करो जो तुम्हारे पास है, भले ही वह कितनी भी कम हो, तो ज़िंदगी तुम्हें हमेशा देती है। मैं इस कुएं के पानी के साथ प्रेम करती हूं क्योंकि यह हमारा जीवन है। मेरी खुशी इस पानी में बहती है।'”
“पर बारिश हुई या नहीं?” लता ने घबराते हुए पूछा। दादी की आंखें नम हो गईं। “हां, मेरी चिड़िया। उसी सप्ताह बारिश हुई। इतनी ज़ोरदार बारिश कि गांव भर में खुशियां गूंजने लगीं। पर जानती हो, असली बारिश तो वह थी जो मेरी दादी के दिल में हमेशा होती थी – जहां हर चीज़ को सम्मान देने की बारिश थी।”
दादी ने लता के माथे पर नरम चुंबन कर दिया। “तुम भी याद रखना, बेटा। जब तुम जो कुछ भी पास है उसे प्यार से रखोगी, तो ज़िंदगी तुम्हें कभी खाली हाथ नहीं छोड़ेगी। यह हमारे गांव की सबसे पुरानी सीख है।” लता ने दादी से चिपकते हुए आंखें बंद कर लीं। दीये की रोशनी धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी जैसे सपनों का संसार खुल गया हो।
🪔 सीख: जो वस्तु या क्षण हमारे पास है, उसकी कद्र करना और प्रेम से उसकी देखभाल करना जीवन की सबसे महान शिक्षा है। वास्तविक संपन्नता मन की शांति और कृतज्ञता में निहित है।







