दीये की रोशनी, दिल की खुशी
गांव के छोर पर एक छोटी सी झोपड़ी थी, जहां बुजुर्ग दादी माता अपनी पोती छोटू के साथ रहती थीं। दिवाली का त्योहार आने वाला था, पर इस बार घर में उदासी छाई थी। छोटू के पिता शहर में काम करते थे और इस बार दिवाली पर घर नहीं आ पाएंगे। दादी माता की सिलवटों वाली चेहरा और भी उदास हो गया था।
“दादी, क्या इस बार दिवाली नहीं होगी?” छोटू ने पूछा। दादी माता ने उसे गोद में बैठाया और कहा, “बेटा, दिवाली तो हमेशा होती है। बस, हमें यह समझना चाहिए कि असली दिवाली तो अंधकार को प्रकाश से जीतने की कहानी है।” छोटू को दादी की बातें समझ नहीं आईं, पर उसके मन में एक नया सवाल जागा।
दिवाली की सुबह, दादी माता ने छोटू को अपने साथ गांव के मंदिर की सीढ़ियों पर बैठाया। वहां उन्होंने एक बूढ़ी महिला को देखा जो बिल्कुल अकेली थी। दादी माता ने छोटू से कहा, “चलो बेटा, हम उनके घर दीये ले जाएं।” छोटू ने मिट्टी के दीये हाथ में लिए और दादी के साथ उस महिला के घर गया।
जब उस महिला ने दीये देखे, तो उसकी आंखों में खुशी की चमक आ गई। वह रो पड़ी और बोली, “बेटा, तुम मेरे लिए यह दीये लाए हो? मेरे अपने बच्चे तो दूर शहर में हैं, पर तुम मेरी दिवाली बन गए हो।” छोटू को समझ आ गया कि दादी क्या कहना चाहती थीं।
उस दिन के बाद, दादी माता और छोटू ने पूरे गांव में दीये बांटने का सिलसिला शुरू किया। हर घर में वे जाते, हर चेहरे को खुश देखते, और हर बार छोटू की समझ बढ़ती। वह जान गया कि असली दिवाली किसी त्योहार का नाम नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में रोशनी लाने का नाम है।
जब दिवाली की रात आई, तो गांव भर के घरों में दीये की रोशनी थी। छोटू ने अपने पिता को दूर से फोन किया और सब कुछ बताया। पिता की आवाज़ में खुशी थी, पर छोटू को महसूस हो गया कि उसका दिल पहले से कहीं ज़्यादा रोशन हो गया है। दादी माता ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “बेटा, जब हम दूसरों को खुश देते हैं, तो ईश्वर हमारे दिलों में अपना घर बना लेते हैं।”
उस दिन के बाद, छोटू के लिए दिवाली केवल एक त्योहार नहीं रह गया। यह उसके दिल में एक अनन्त रोशनी बन गई, जो हर साल उसे दूसरों की खुशी में बांटने के लिए कहती है।
🪔 सीख: असली त्योहार वह नहीं जो हम अकेले मनाते हैं, बल्कि वह है जब हम दूसरों के जीवन में खुशी और रोशनी ले आते हैं। प्रकाश सिर्फ घरों को नहीं, बल्कि दिलों को भी रोशन करता है।



