दीये की रोशनी
गांव के छोर पर एक छोटी सी झोपड़ी थी, जहां बुज़ुर्ग दादी अपनी पोती रीना के साथ रहती थीं। दिवाली आने वाली थी, पर इस बार घर में खुशियां नहीं थीं। दादी की आँखों की रोशनी चली गई थी और रीना का पिता शहर में काम की वजह से दूर था।
रीना नौ साल की थी, पर समझदारी बड़ों जैसी थी। वह देखती थी कि दादी दिवाली की तैयारी कैसे करतीं—मिट्टी के दीये को हाथों से मूंज और घास से साजा करतीं, फिर खीर और हलवा पकातीं। पर इस बार दादी बस खामोश बैठी रहतीं।
एक दोपहर, रीना ने पड़ोस से मिट्टी मंगवाई। उसने अपनी छोटी उंगलियों से दीये बनाने की कोशिश की—टेढ़े-मेढ़े, अजीब आकार के दीये। लेकिन हर बार जब वह दादी के पास जाती और अपनी रचना दिखाती, तो दादी हाथ बढ़ाकर उन्हें छूती और मुस्कुरा देती।
“बेटा, ये सब से सुंदर दीये हैं,” दादी कहतीं, हालांकि उन्हें दिख नहीं सकते थे।
रीना समझ गई। उसने गांव की सभी महिलाओं से मदद मांगी। दादी की चहेती महिलाएं रीना के साथ बैठीं और दीये तैयार किए। रीना ने हर दीये की कहानी दादी को सुनाई—किस महिला ने कौन सा दीया बनाया है।
दिवाली की शाम आ गई। रीना ने घर के हर कोने में दीये रख दिए। जब उसने पहला दीया जलाया, तो दादी की आँख से आंसू निकल गए। “मेरी बिटिया,” दादी ने रीना को गले लगा लिया, “तुम्हारी प्रेम की रोशनी मेरे अंधकार को दूर कर गई।”
उस रात, घर भर में दीयों की पीली रोशनी फैली थी। दादी को नहीं दिख रहा था, पर उन्हें महसूस था कि हर दीया उनके पोती के हाथों से बना है, उसके दिल से आया है।
जब पिता शहर से लौटे, तो उन्होंने अपनी बेटी के साथ बैठकर हर दीये की कहानी सुनी और रो पड़े। उस दिवाली को उन्होंने कभी नहीं भूला—जहां रोशनी नहीं, प्रेम जलता था।
🪔 सीख: सच्ची खुशियां बाहर से नहीं, दिल से आती हैं। छोटे हाथ भी बड़े-बड़े अंधकार को दूर कर सकते हैं, जब वे प्रेम से भरे हों।
