अंतिम आरती
गांव के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे, ठाकुर का घर था। इसी घर में राधा का जन्म हुआ था, जब ठाकुर को पहली बार बेटी होने की खुशखबरी मिली। वह रात भर पटाखे फोड़ते रहे थे। अब उसी राधा की विदाई का दिन था।
सुबह-सुबह ठाकुर छत पर खड़े थे, हाथ में लकड़ी का बेंत पकड़े। उनके हाथ कांप रहे थे। शहर से दामाद की बारात आने वाली थी। पचास साल का यह मजबूत आदमी, जिसने कभी किसी के सामने आंख नहीं झुकाई थी, अब अपनी आंखें बार-बार पोंछ रहा था। पत्नी सुमन नीचे आंगन में सजावट करवा रही थी, लेकिन राधा कहीं नहीं दिख रही थी। ठाकुर को पता था कि वह अपने कमरे में है, अकेली रो रही है।
ठाकुर उस कमरे में गए जहां उनकी बेटी बैठी थी, नई साड़ी पहने हुए, महावर लगे हाथों को आंचल में छिपाए। जैसे ही ठाकुर को देखा, राधा का चेहरा और भी उदास हो गया। ठाकुर ने उसके बाल में फूल सजाने लगे, वैसे ही जैसे वह छोटी थी। कोई शब्द न बोला, सिर्फ हाथ बोल रहे थे।
“बाबा, मैं डर रही हूं,” राधा की आवाज़ कांपी।
ठाकुर बैठ गए, और अपनी बेटी को गोद में ले लिया। “डर मत, बेटा। तूने सीखा है न, घर कैसे चलता है? तूने देखा है न, माता को कैसे सेवा करता हूं? तूने सीखा है न, प्रेम का मतलब?”
“लेकिन वहां अकेली हूंगी,” राधा ने फुसफुसाया।
ठाकुर ने बेटी के सिर पर हाथ रखा। “तूने कभी देखा है पीपल का पेड़? सारी शाखें अलग-अलग दिशा में जाती हैं, लेकिन सब जड़ से जुड़ी होती हैं। तू भी ऐसे ही, नया घर अलग है, पर तेरा दिल हमेशा इसी घर में रहेगा।”
दोपहर को बारात आई। ठाकुर ने दामाद को गोद में बैठाया, पर उनकी आंखें सिर्फ राधा पर थीं। शादी के बाद, जब राधा को विदा करने का समय आया, गांव की सभी महिलाएं रो रही थीं। लेकिन ठाकुर ने राधा को अपने सीने से लगाया और कहा, “जाओ बेटा, खुश रहो। तुम्हारी खुशी ही मेरी पूजा है।”
रात को, जब सब सो गए, ठाकुर अकेले पीपल के नीचे बैठे थे। हवा में पत्तों की सरसराहट थी, और चांद उन्हें देख रहा था। उन्होंने अपनी बेटी के लिए आशीर्वाद दिया—न कि शब्दों में, बल्कि अपने खामोश आंसुओं में।
🪔 सीख: बेटी माता-पिता का हृदय होती है। विदाई केवल अलगाव नहीं, बल्कि प्रेम को नए घर तक फैलाने का पल है। सच्चा प्यार कभी दूरी नहीं जानता।



