अंतिम नृत्य

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गांव के बागेश्वर में जब सूरज डूबने लगा तो आंगन में दीये जल गए। लक्ष्मी की विदाई का दिन था। उसके पिता राम कुमार पूरे दिन मेहमानों से मिलते रहे, पर जब सब चले गए तो वह अकेले कोने में बैठ गए, अपनी बेटी को देखते हुए।

लक्ष्मी का लहंगा सोने जैसा चमक रहा था। उसकी सास ने उसे सजाया था, पर राम कुमार को यह सब नहीं भा रहा था। उन्हें लगा कि कोई उनकी बेटी को चुरा ले जा रहा है। बेटा तो आता है, पर बेटी… बेटी तो नहीं आती कभी।

लक्ष्मी ने अपने पिता को देखा और उनके पास बैठ गई। उसने उनका हाथ पकड़ा। “बाबा, आप उदास क्यों हो?” उसकी आवाज़ में वह बचपन था जब वह उनकी ऊंगली पकड़कर घूमती थी खेत में।

राम कुमार कुछ न कह सके। उनका गला भर आया। बारह साल की उम्र से वह लक्ष्मी को अपनी बहू के लिए संभाल रहे थे – खाना बनाना सिखाया, घर के काम सिखाए, पर अब जब वह जाने वाली थी तो सब कुछ बेकार लगा।

“बाबा, याद है न?” लक्ष्मी ने मुस्कुराते हुए कहा। “मैं हर महीने तुम्हारे पास आऊंगी। और अगर कभी तुम्हें मेरी ज़रूरत हो तो मैं घर वापस आ जाऊंगी। कोई भी परदेस मुझे बाप से दूर नहीं कर सकता।”

राम कुमार के आंसू बह गए। वह जानते थे कि यह सच नहीं है। शादी के बाद बेटी का पहला कर्तव्य उसके परिवार का होता है। पर लक्ष्मी की ये बातें उनका दिल सांत्वना दे गईं।

रात को जब विदाई की रस्म हुई तो सब महिलाएं गीत गा रही थीं। लक्ष्मी की मां, दादी, चाची सब रो रही थीं। पर राम कुमार ने अपने आंसू रोक लिए। वह अपनी बेटी को मुस्कुराता चेहरा दिखाना चाहते थे। जब लक्ष्मी दहलीज़ पर खड़ी हुई तो उसने पीछे मुड़कर अपने पिता को देखा।

“बाबा, मैं जाती हूं,” उसने कहा।

राम कुमार ने आगे बढ़कर उसके माथे को चुंबन किया। उन्होंने कोई शब्द नहीं कहे। उनके मौन में सारी दुनिया की पीड़ा थी – माता-पिता की वह पीड़ा जो कभी गायब नहीं होती।

गांव में एक नई परंपरा शुरू हुई उसी रात। राम कुमार हर महीने की पहली तारीख़ को अपने खेत के सिरे पर बैठते, जहां से रास्ता शहर की ओर जाता था। वह देखते रहते कि कहीं उनकी लक्ष्मी मिलने तो नहीं आई। और लक्ष्मी भी – भले ही हर महीने न आ सकी – पर वह आती रही। उसकी खुशी उसके पिता की खुशी थी।

बरसों बाद जब राम कुमार बूढ़े हो गए तो गांव के लोग कहते थे – “देखो, बेटी की विदाई से भी प्यार नहीं टूटता। टूटता है बस ख़ाली पन, और उसे भरने के लिए बस याद चाहिए होती है।”


🪔 सीख: बेटी के जाने से पिता का प्यार कम नहीं होता, बल्कि बदल जाता है – एक गहरे रिश्ते में। सच्चा प्यार दूरी को नहीं मानता, और विदाई सिर्फ़ एक शुरुआत है अनोखे रिश्ते की।

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