गांव के चौपाल पर बैठे राधाकांत ने अपनी बेटी की विदाई के दिन की सूरज की पहली किरण को देखा। पचास साल का यह किसान सारी रात सो नहीं पाया था। आंगन में लगी हल्दी और मेहंदी की खुशबू अब कड़वी लग रही थी। उसके हाथ काँप रहे थे—न डर के, न खुशी के, बल्कि उस खालीपन के डर से जो आज के बाद आएगा।
पत्नी मीरा सुबह जल्दी उठ गई थी। वह आंगन में बैठकर अपनी बेटी मुनिया की जरूरत की चीजें फिर से देख रही थी। पर राधाकांत को पता था कि उसे चीजें नहीं, बस बेटी की याद देख रही है। बीस साल पहले जब मुनिया का जन्म हुआ था, तो राधाकांत ने गांव के मंदिर में सौ दीये जला दिए थे। वह बेटी के पहले कदम के दिन सबसे ज्यादा खुश था। पहली बारिश में वह मुनिया को लेकर खेत में दौड़ा था, और बेटी की हंसी गांव की सबसे मधुर ध्वनि बन गई थी।
दुपहर को दूल्हे के साथ बारात आ गई। राधाकांत ने मुनिया को दुल्हन की सज में देखा और उसका दिल टूट गया। यह कौन थी उसकी बेटी—यह अनजान लड़की, इतने सोने-चांदी से सजी हुई कि उसका असली चेहरा भी दिखता नहीं था। पर जब मुनिया ने अपने पिता की ओर देखा, तो उसकी आंखों में भय और प्रश्न था। राधाकांत समझ गया कि यह भय उसका अपना भय था।
शाम ढलते ही विदाई का समय आ गया। मंदिर में सातों फेरे पूरे हो गए थे। अब मुनिया को जाना था। आंगन में सब औरतें रो रही थीं—मीरा, दादी, मामियां। पर राधाकांत का गला भर आया था। वह अपनी बेटी के सामने खड़ा था, पर कुछ कह नहीं पा रहा था।
तभी मुनिया ने अपने पिता के पैर छुए। राधाकांत ने उसे गोद में उठाया, जैसे वह अभी भी छोटी बच्ची थी। ‘बेटा,’ उसके मुंह से निकला, पर आवाज़ आखिरी शब्द पर टूट गई। मुनिया रो पड़ी। उसने अपने पिता से कहा, ‘अब्बा, मैं दूर जा रही हूं, पर मेरा दिल यहीं रह जाएगा। आप मेरी आवाज़ सुनेंगे हर सुबह, हर रात, हर मेहंदी की खुशबू में।’
राधाकांत ने अपनी बेटी को आशीर्वाद दिया। उसने कहा, ‘बेटा, जीवन में जब भी अकेलापन लगे, याद करना कि तुम्हारा बाप हमेशा तुम्हारे साथ है। तुम्हारी हंसी ही मेरा सबसे बड़ा धन है।’ मुनिया दुल्हन की तरह नहीं, एक बेटी की तरह उसके सीने से लिपट गई।
जब बारात चली गई, तब राधाकांत अकेले खेत की ओर चला गया। वहां, उसने अपने हाथों से उगाए गए गेहूं को देखा और समझ गया कि पेड़ को फल देना होता है, भले ही वह दूर चला जाए। बेटी की विदाई उसके लिए एक नई शुरुआत था—प्रेम की परिभाषा को फिर से समझने की।
🪔 सीख: बेटी की विदाई गहरा दर्द है, पर यह प्रेम का एक और रूप है। माता-पिता का प्रेम बंधन नहीं, बल्कि पंख है जो बेटी को उड़ने के लिए देता है। दूरी भले ही शारीरिक हो, पर हृदय का रिश्ता सदा अटूट रहता है।

