दीये की रोशनी, दिल की बातें
गांव की सीमा पर बसे एक कच्चे घर में रहता था दस साल का मोहन। दिवाली की तैयारी पूरे गांव में जोरों पर थी, पर मोहन के घर का माहौल उदास था। उसके पिता शहर में काम करते थे और इस बार दिवाली पर घर नहीं लौट सकते थे। माता जी ने मोहन को समझाया था, पर बालमन समझ में कहां आता है। हर दिन वह अपने पड़ोसी राज के घर जाकर दिवाली की तैयारी देखता—झूमर सजाते, रंग-बिरंगी झालरें लगाते, मिठाइयों की खुशबू आती।
दिवाली की शाम को माता जी ने मोहन के हाथों में कुछ पैसे पकड़ा दिए। उन्होंने हल्के मन से कहा, ‘बेटा, बाज़ार जाकर दीये खरीद आ। हम भी अपने घर को दीयों से सजाएंगे।’ मोहन उदास मन से बाज़ार की ओर चल दिया। वहां उसे एक बूढ़ा दीये बनाने वाला मिला। उसके कांपते हाथ मिट्टी को प्रेम से आकार दे रहे थे। मोहन ने पूछा, ‘दादा जी, आप अकेले ही सब दीये बनाते हो?’ बूढ़े ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘बेटा, अपने हाथों से बनाया हर दीया किसी का घर रोशन करता है। मेरा बेटा भी शहर में है, पर मेरे ये दीये उसके घर में भी जल रहे होंगे।’
मोहन को एक नया नज़रिया मिल गया। उसने दीये खरीदे और घर लौटकर माता जी को अपनी सोच बताई। माता जी की आंखें भर आईं। उन्होंने मिट्टी का एक बड़ा दीया निकाला और बोलीं, ‘बेटा, तुम्हारे पापा भले यहां न हों, पर उनका प्यार इसी दीये में बंद है।’ फिर वे दोनों ने घर के आंगन में दीये सजाए। हर दीये को जलाते समय मोहन ने अपने पिता को याद किया, पर अब पीड़ा नहीं, बल्कि एक गहरा प्रेम महसूस हुआ।
रात को जब पूरा आंगन दीयों की नीली और पीली रोशनी से भर गया, माता जी ने मोहन को गोद में बैठा लिया। दूर से गांव की खुशियों की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं, पर मोहन को लगा कि उसके छोटे घर की यह रोशनी पूरे संसार की रोशनी है। दिवाली सिर्फ परिवार के साथ होना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की भावनाओं को समझना है। उस रात मोहन ने सीखा कि दूरी कभी प्रेम को मिटा नहीं सकती—बस दीयों की रोशनी हर दिल तक पहुंच जाती है।
🪔 सीख: त्योहार सिर्फ मिठाइयां और सजावट नहीं, बल्कि प्रियजनों के साथ भावनाओं को साझा करना है। दूरी में भी प्रेम की रोशनी हर दिल को जोड़ती है।




