गांव के बीचों-बीच एक पुरानी बरगद की छाया में हर साल सबसे बड़ा मेला लगता था। लेकिन इस बार का मेला खास था, क्योंकि छोटे मुन्ना के लिए यह पहला मेला था।
मुन्ना छः साल का था। उसकी दादी उसे हर दिन बताती थीं मेले की कहानियां—रंगीन झूलों की, कठपुतली के नाच की, और मीठे गुड़ की चाशनी वाली खीर की। लेकिन मुन्ना कभी मेला देख नहीं पाया था। उसके पैर की बीमारी ने उसे घर में बांध रखा था।
इस बार मुन्ना के पिता उसे मेले ले जाने का सपना देख रहे थे। मेले की तैयारी शुरू हो गई। गांव भर के लोग झूले सजाने, रंग करने, और रस्सियां तनने में लगे हुए थे। हवा में खुशियों की सुगंध थी।
मेले का दिन आ गया। मुन्ना को सुबह-सुबह जगाया गया। उसकी दादी ने उसके सिर पर नीलकंठी तेल की मालिश की, नए कपड़े पहनाए और उसके हाथ में एक छोटा कंगन बांध दिया। पिता ने उसे गोद में उठा लिया।
जैसे ही गांव के मैदान में पहुंचे, मुन्ना की आंखें खुली रह गईं। लाल, पीले, नीले और हरे रंगों से सजे झूले आसमान को छू रहे थे। नगाड़े की थाप से धरती कांप रही थी। कठपुतली वाले अंकल ने अपने पर्दे पर आलू और प्याज को नाचते-गाते दिखाया। सब लोग हंस-हंस कर लोट-पोट हो गए।
फिर दादी ने उसके लिए खीर ला कर दी। मुन्ना ने अपनी दादी के चम्मच से खीर खाई, और हर बार मुस्कुराता था। पिता उसे झूलों के पास ले गए, जहां उसने अपना हाथ बढ़ाकर झूले को छुआ। शायद अगले साल वह इस पर बैठ सकेगा, पिता ने सोचा।
संध्या समय, जब तारे आसमान में टिमटिमाने लगे, गांव वालों ने एक बड़ी बैठक की। सब्जियों की सुगंध, मिठाइयों की महक, और बच्चों की किलकारियां हवा में तैर रही थीं। मुन्ना अपने पिता की गोद में सो गया, लेकिन उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कुराहट थी।
दादी ने मुन्ना के सिर को हाथ से सहलाते हुए कहा, ‘बेटा, मेला सिर्फ झूलों और खीर का नहीं होता। मेला तो दिलों का मिलना है। आज तुम्हारे दिल ने गांव से प्यार कर लिया। बस यही असली मेला है।’
उस रात, मुन्ना के सपनों में झूले उड़ रहे थे, और कठपुतलियां नाच रही थीं। पर सबसे प्यारी बात यह थी कि उसके आस-पास उसका पूरा गांव हंस रहा था।
🪔 सीख: असली खुशी और उत्सव घर के प्रेम, परिवार की गर्माहट और समाज से जुड़ने में है। हर परिस्थिति में प्यार और देखभाल से भरे दिल को ही सच्चे मेले का अनुभव मिलता है।


