छोटे से गांव बड़ापुर में साल भर का इंतज़ार सिर्फ एक चीज़ के लिए होता था – गांव का मेला। जब मई का महीना आता, तो पूरा गांव रंगों से सज जाता था। बाज़ारों में झूलियां लगने लगती थीं, कठपुतलियों के नाच की तैयारी होने लगती थी और हर घर में खुशियों की सौगंध फैल जाती थी।
नौ साल का राज इस साल मेले के लिए बेहद बेचैन था। उसकी दादी ने उसे खुद बनाए खीर के दोनों पकड़ा दिए थे, और पापा ने पचास रुपये की नई तिजोरी में भर दिए थे। लेकिन राज का दिल किसी खिलौने या मिठाई के लिए नहीं, बल्कि उस रहस्यमय कठपुतली के लिए धड़कता था जिसकी कहानी पिछले साल सुनी थी।
मेले का पहला दिन आया। गांव के चौपाल पर हज़ारों लोग इकट्ठा हुए। रंग-बिरंगी झूलों की घंटियां बजने लगीं। खिलौनों की दुकानों के आगे बच्चों की भीड़ दिखने लगी। लेकिन राज सीधा उस पुरानी दीवार के पास गया जहां कठपुतलियों का नाच होता था।
वहां एक बुज़ुर्ग कठपुतली कार की तैयारी कर रहा था। उसका नाम था दादा रामू। जब उसने राज को देखा, तो मुस्कुरा दिया। “अरे, पिछले साल वाला लड़का! तुम्हें याद है मेरी राजा की कठपुतली?” राज का दिल जोर से धड़कने लगा। यह तो बिल्कुल वही बात थी जो उसके मन में था।
दादा रामू ने उसे अंदर आने का इशारा किया। एक पुरानी झोपड़ी में राज को सबसे खूबसूरत कठपुतली दिखाई – सोने के कपड़ों में, मोतियों से सजी, जिसकी मुस्कुराहट ऐसी थी कि लगता था कि वह सचमुच हंस रही है। “यह राजा की कहानी है,” दादा ने कहा, “जो अपनी पूरी दौलत अपनी प्रजा के लिए लगा देता है।”
राज रोज़ मेले में जाने लगा। हर दिन कठपुतलियों का एक नया नाच, हर दिन एक नई कहानी। धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि इन कठपुतलियों के पीछे केवल तार नहीं, बल्कि गांव के लोगों की सदियों पुरानी यादें और रिश्ते थे।
आखिरी दिन जब मेला खत्म होने को आया, तो राज के पापा को पता चल गया कि लड़का कहां जाता है। वे भी दादा रामू के साथ बैठ गए। उन्हें एहसास हुआ कि उनका पिता भी दादा रामू से ही कहानियां सुनते थे। यह परंपरा तीन पीढ़ियों का सेतु बना था।
मेला खत्म हुआ, दुकानें समेट ली गईं, पर राज के दिल में मेले की रौनक कभी गई नहीं। और अगले साल जब फिर से मई का महीना आया, तो राज पहले ही दादा रामू के पास पहुंच गया, क्योंकि अब वह जानता था कि असली मेला तो रिश्तों का मेला है, जो हर दिल में लगता है।
🪔 सीख: जीवन के सबसे बड़े मेले में सबसे कीमती चीज़ें रिश्ते, परंपराएं और एक-दूसरे की कहानियों को सुनने का समय है। खुशियां खिलौनों में नहीं, बल्कि उन यादों में छिपी होती हैं जो हम अपने परिवार और गांव के साथ बांटते हैं।

