गांव के छोर पर एक पुरानी ईंटों का स्कूल था, जिसकी छत से उजली धूप रिसती थी। इसी स्कूल में पढ़ता था गोलू – काली मिट्टी में लिथड़ा, जिसकी पेंट में हमेशा छेद होते थे। उसके साथ थे उसके दोस्त – पगली, मनु और छोटू। ये चारों मास्टर जी के लिए हर दिन एक नई परीक्षा लेकर आते थे।
मास्टर जी का नाम था हरिप्रसाद शर्मा। उनके सफेद बालों के बीच गंजापन झलकता था, और उनकी आंखों में हमेशा एक नर्म मुस्कान रहती थी। उन्होंने तीस साल से इसी गांव के बच्चों को पढ़ाया था। पर गोलू की शरारतें उन्हें भी परेशान कर देती थीं। एक बार गोलू ने चॉक की सफेद धूल को पानी में गीला करके दीवार पर राक्षस बना दिया। मास्टर जी हंस पड़े, पर डांट भी लगानी पड़ी।
जब गर्मी की छुट्टियां आईं, तो स्कूल के बाहर का बोर्ड उतार दिया गया। गोलू और उसके दोस्तों को लगा कि अब स्कूल मर गया। पूरे दिन वे स्कूल के पास की नहर में तैरते, पेड़ों से आम तोड़ते, और रेत से महल बनाते। एक दिन गोलू को एक कौआ मिला जिसका पंख टूटा हुआ था। वह चिड़िया को घर ले आया।
गोलू ने उस कौए को ‘कारा’ नाम दिया और हर दिन उसे अनाज देता। मनु कहता, ‘अरे, इसे छोड़ दे, यह तो दुष्ट कौआ है।’ पर गोलू रोज उसके घाव पर नीम का पत्ता लगाता, उसे प्रेम से खिलाता। महीने भर बाद, जब पंख भर गए, तो कारा उड़ गया। गोलू की आंखों में खुशी की बूंदें थीं।
जब स्कूल फिर खुला, तो गोलू को एक बात समझ आई जो किताब में नहीं थी – प्रेम और धैर्य। मास्टर जी ने उसे पढ़ाई में मेहनत करते देखा। एक दिन क्लास में गोलू ने अपने सभी दोस्तों को बताया कि उसने कैसे घायल कौए को ठीक किया। मास्टर जी खामोशी से सुनते रहे। पढ़ाई खत्म होने के बाद उन्होंने गोलू को अपने पास बुलाया।
‘गोलू, तुम्हें पता है, तुम जो कर रहे थे वह कोई शरारत नहीं थी? यह जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा थी।’ मास्टर जी ने कहा। ‘किताबें हमें संख्या और अक्षर सिखाती हैं, पर करुणा और धैर्य? ये तो दिल से आते हैं। तुम पहले से ही सीख रहे हो।’
उस दिन गोलू को समझ आया कि बचपन की शरारतें असल में सीखने का ही तरीका हैं। और मास्टर जी की असली शिक्षा वह नहीं थी जो वे बोर्ड पर लिखते थे, बल्कि वह थी जो उन्होंने हर बच्चे के दिल में बीज बोते थे।
🪔 सीख: बचपन की मासूम शरारतें और जिज्ञासाएं असल में सीखने का रास्ता हैं। सच्ची शिक्षा किताबों में नहीं, दिल में मिलती है – प्रेम, करुणा और धैर्य से।



