गांव के पास की पहाड़ी पर एक छोटा सा स्कूल था। उसकी दीवारें गेहूंई रंग की थीं और छत पर मिट्टी की खपरैलें सजी रहती थीं। यहां का मास्टर जी, श्री शर्मा, गांव के सबसे प्यारे व्यक्ति थे।
स्कूल में तीन अभिन्न दोस्त पढ़ते थे—राज, मीरा और छोटू। राज किताबें पढ़ने का शौकीन था, मीरा हमेशा सवाल पूछती थी, और छोटू? वह तो स्कूल में सबसे बड़ा शरारती था। उसके खिलाफ मास्टर जी के पास हर दिन शिकायतें आती थीं।
एक दिन की बात है। मास्टर जी ने कक्षा में बैठकर गणित पढ़ा रहे थे। अचानक उन्हें लगा कि कोई चीज़ गायब है। उनकी चश्मा! छोटू ने मास्टर जी की चश्मा चुपचाप उठा ली थी। जब मास्टर जी को समझ आ गया, तो वह हंस पड़े। ‘छोटू, आओ यहां,’ मास्टर जी ने प्यार से कहा।
छोटू डर गया। लेकिन मास्टर जी ने उसे डांटा नहीं। उन्होंने उसे बुलाकर बैठाया और कहा, ‘बेटा, तुम बहुत बुद्धिमान हो। यह शरारत करने की बजाय, अगर तुम इसी बुद्धि को पढ़ाई में लगाओ, तो कितना अच्छा होगा।’
छोटू की आंखों में आंसू आ गए। उस दिन के बाद, वह दिन भर सोचता रहा। अगले दिन, छोटू अपना पाठ तैयार करके स्कूल आया। मास्टर जी ने जब उसे पढ़ते सुना, तो उसे अपने सिने से लगा लिया।
समय गुज़रता गया। वर्षों बाद, गांव में एक नया स्कूल बना। नए स्कूल का प्रबंधक कौन था? छोटू! वह अब शिक्षक बन चुका था। और जब भी कोई बच्चा शरारत करता, तो छोटू अपने मास्टर जी की तरह उसे समझाता।
राज अब किताबों का संग्रह करता था और मीरा एक डॉक्टर बन गई थी। लेकिन तीनों कभी अपने उस छोटे से स्कूल को नहीं भूले, जहां मास्टर जी की प्यार भरी नज़र से उन्होंने सीखा कि शरारत नहीं, बल्कि शिक्षा और प्रेम ही जीवन का असली खेल है।
🪔 सीख: हर बच्चे में छिपी हुई प्रतिभा होती है। प्रेम और समझदारी से उसे निखारा जा सकता है। डांट-डपट नहीं, बल्कि स्नेह और सही मार्गदर्शन ही एक बच्चे को सही रास्ते पर ला सकता है।

