गांव के दो भाई
नरपत और महेंद्र गांव के समृद्ध जमींदार के दो बेटे थे। जब बाप चल बसा, तो उसकी बीस बीघे जमीन को लेकर दोनों भाइयों में जबरदस्त झगड़ा शुरू हो गया। नरपत को लगा कि उसने बाप की देखभाल ज्यादा की है, इसलिए उसे ज्यादा जमीन मिलनी चाहिए। महेंद्र का कहना था कि बराबर की विरासत ही न्यायसंगत है। तीन महीने की कानूनी लड़ाई के बाद जमीन बंट तो गई, पर दोनों भाइयों के दिलों में कड़वाहट की खाई खुद गई।
नरपत अपनी दस बीघे जमीन पर अकेला खेती करता था, जबकि महेंद्र अपने हिस्से पर। गांव के चौपाल पर भी वे एक-दूसरे को नजरअंदाज करने लगे। उनकी माता इस विभाजन से टूट गईं। हर रात वह चुपचाप अपने कमरे में रोतीं, पर दोनों बेटे अपनी जिद में इतने अंधे थे कि माता का दर्द समझ ही न आया।
उस साल गांव में भीषण सूखा पड़ा। तालाब सूख गए, कुएं भी नीचे चले गए। नरपत की फसल तबाह हो गई। महेंद्र के पास भी मुश्किलें थीं, पर उसके दक्षिण की ओर एक पुरानी बावड़ी थी जो सदियों से पानी देती आ रही थी। इस बार भी उसमें पानी था, पर गहरे बहुत गहरे। नरपत के पास पैसे नहीं थे तक-तक खुदवाने के लिए। जमीन तो थी, पर पानी के बिना मिट्टी सूनी थी।
एक तपती दोपहर नरपत अपने सूखे खेत में खड़ा रो रहा था, जब एक बुजुर्ग संत गांव से गुजर रहे थे। उन्होंने नरपत को समझाया, ‘बेटा, जमीन को बांटकर तुमने अपने भाई को नहीं, अपने आप को तोड़ा है। भाई जो है, वह पानी की तरह है—साझा करने से बढ़ता है, न कि घटता है।’
ये बातें नरपत के दिल को छू गईं। उसने महेंद्र के घर जाने का साहस किया। दोनों दिन भर रोए, गले लगे। महेंद्र ने अपनी बावड़ी से पानी निकालना शुरू किया और नरपत को साझा करने दिया। उन्होंने अपनी जमीनें फिर से एक करने का फैसला नहीं लिया, पर उन्होंने एक साझा सिंचाई व्यवस्था बना दी। दोनों मिलकर खेत करने लगे।
उस साल की फसल बेहद अच्छी हुई। गांव के लोग हैरान रह गए कि कैसे इन दोनों की जमीन इतनी हरी-भरी रह गई जबकि चारों तरफ सूखा था। असली सच यह था कि भाइयों के दिलों में फिर से प्रेम की बारिश हुई थी।
🪔 सीख: जमीन-जायदाद में बंटवारे से कोई भी खुश नहीं होता, पर भाई-चारे में बंटवारे से सब कुछ बढ़ता है। रिश्तों की कीमत विरासत से कहीं ज्यादा होती है। जब हम बड़े हो जाते हैं, तो अपने अहंकार को भूलकर प्रेम करना ही असली विजय है।

