नदी की आरती का चमत्कार
गांव के घाट पर शाम ढलते ही एक अलग ही रंग आ जाता था। नर्मदा नदी की लहरें सूर्यास्त की सुनहरी रोशनी में नाचने लगती थीं। यह घाट सदियों से गांव की जीवनधारा का केंद्र था—यहां महिलाएं कपड़े धोती थीं, बच्चों को नहलाती थीं, और शाम को देवता को समर्पित आरती होती थी।
इसी घाट पर रहती थी आठ साल की अंशु, जिसके पिता कुछ महीने पहले एक बीमारी से चल बसे थे। अंशु अपनी मां के साथ घाट पर कपड़े धोने का काम करती थी। घर में अनाज के दाने गिनने पड़ते थे, फिर भी अंशु कभी उदास नहीं दिखती। उसकी दादी कहती थीं, ‘बेटा, नदी देवता हैं। वह सब कुछ जानते हैं।’
एक शाम को अंशु की मां बहुत बीमार हो गईं। ज्वर इतना तेज़ था कि वह बिस्तर से उठ नहीं सकीं। गांव का वैद्य आया, दवाइयां दीं, लेकिन कोई असर नहीं हुआ। अंशु रात भर अपनी मां के बगल में बैठी रही, उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखती रही। तीसरी सुबह जब बुखार और भी बढ़ गया, तो दादी ने कहा, ‘बेटा, आज शाम को नदी की आरती करना। पूरी श्रद्धा से, पूरे दिल से।’
अंशु के पास आरती के लिए दीये बनाने का मिट्टी भी नहीं था। घर में सिर्फ एक टूटा हुआ दीया और थोड़ा सा तेल था। पड़ोस की दादी ने कहा, ‘ले, मेरे पास कुछ दीये हैं, ले जा।’ दूसरी दादी ने थोड़ा तेल दिया, किसी ने फूल दिए। इसी तरह पूरा गांव अंशु के साथ खड़ा हो गया।
शाम को जब सूरज लाल-पीले रंग में डूबने लगा, तब अंशु अपने हाथों में दीये लेकर घाट पर गई। उसके हाथ कांप रहे थे, लेकिन उसकी आंखों में पवित्रता और विश्वास था। उसने नदी की ओर देखा और फुसफुसाया, ‘नदी देवता, मेरी मां को ठीक कर दो। मैं जिंदगी भर तुम्हारी सेवा करूंगी।’ फिर उसने दीये नदी में प्रवाहित किए। दीये एक के बाद एक नदी की लहरों पर तैरते गए, उनकी नीली-सुनहरी रोशनी पानी में प्रतिबिंबित होती गई।
रात भर अंशु घाट पर ही बैठी रही, नदी की गीत सुनती रही। सुबह जब वह घर पहुंची, तो मां की आंखें खुली थीं। बुखार पूरी तरह उतर गया था। मां ने अंशु को गोद में भरा और रोने लगी। दादी ने आसमान की ओर देखा और कहा, ‘देख, बेटा, नदी कभी निराश नहीं करती।’
उस दिन के बाद से अंशु हर शाम घाट पर जाती है, नदी के लिए आरती करती है। और गांव की महिलाएं भी उसके साथ जाने लगीं। आज वह बड़ी हो गई है, पर घाट पर उसकी आरती कभी नहीं रुकी। क्योंकि वह जानती है कि श्रद्धा और विश्वास का चमत्कार नदी की हर लहर में बसा है।
🪔 सीख: सच्ची श्रद्धा और विश्वास का कोई सीमा नहीं होती। जब हम अपने दिल की शुद्धता और समर्पण से किसी भी देवता को अर्पण करते हैं, तो वह ज़रूर हमारी सुनता है। साथ ही, समाज का सहयोग और एक-दूसरे का साथ हमारे कठिन समय को आसान बना देता है।


