नदी के घाट पर देवी का दीया

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गांव के किनारे बहने वाली नदी का घाट गांववासियों का सबसे पवित्र स्थान था। हर शाम को जब सूरज पश्चिम में डूबने लगता, तो लोग अपने-अपने घरों से दीये, फूल और अगरबत्ती लेकर घाट की ओर दौड़ पड़ते। इसी गांव में रहती थी नौ साल की कन्या, जिसका नाम था मीरा। उसके पिता किसान थे और माता सरल मन की महिला। मीरा के घर में कभी कोई भी बड़ी चीज़ नहीं रही, लेकिन घाट पर आरती करने की परंपरा कभी नहीं टूटी।

उस साल गांव में सूखा पड़ गया। नदी का पानी घटने लगा, खेत सूख गए, और किसानों के चेहरों पर चिंता की रेखाएं गहरी हो गईं। मीरा का पिता भी हर दिन मंदिर जाता और देवी से प्रार्थना करता कि बारिश हो जाए। लेकिन आसमान से बादल आने का नाम नहीं ले रहे थे। गांववासी सोचते थे कि इस बार शायद आरती की परंपरा छूट भी सकती है, क्योंकि घाट पर पानी लगभग समाप्त हो गया था।

एक शाम, जब सूरज की लाल किरणें नदी की सूखी बालू पर पड़ रही थीं, मीरा की माता ने घर में दीये बनाए। मीरा ने अपनी मां से पूछा, ‘माता, जब नदी में पानी ही नहीं है, तो हम आरती कैसे करेंगे?’ माता ने प्रेम से उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, ‘बेटा, नदी पानी से नहीं, श्रद्धा से भरी है। देवी की आरती वह नहीं मांगती जो हमारे पास है, वह देखती है हमारे दिल में क्या है।’

घाट पर जब लोग पहुंचे, तो वहां मुश्किल से पांच-छह परिवार थे। मीरा अपनी माता के साथ खड़ी थी, उसके हाथ में एक मिट्टी का दीया था जो उसने स्वयं बनाया था। जैसे ही पहला दीया नदी की सूखी बालू पर रखा गया, अचानक आसमान में बादल दिखाई दिए। पहली बूंद गिरी। फिर दूसरी। और जब मीरा ने अपना दीया रखा, तो एक तेज़ चमक हुई और आसमान बारिश करने लगा।

लोग चकित रह गए। बारिश उस रात भर चलती रही। सुबह जब लोग घाट पर गए, तो नदी का पानी फिर से आ गया था। गांव की मिट्टी गीली हो गई थी। किसान खुशी से रो पड़े। पड़ोसी बूढ़े ने मीरा को देखा और कहा, ‘छोटी बहू, तुम्हारी श्रद्धा ही तो नदी बन गई। तुम्हारा दीया अंधकार नहीं, सूखे का अंत करने वाला दीया था।’

उसके बाद से गांव में एक नया रिवाज़ जुड़ गया। हर शाम को आरती के समय सभी घाट पर पहुंचते थे, और मीरा हमेशा अपने दीये के साथ पहले आती। गांववासियों को विश्वास हो गया कि नदी की देवी केवल पानी नहीं देती, वह भक्त के दिल की बात सुनती है। और मीरा जानती थी कि सच्ची श्रद्धा सूखी नदी को भी बहाने की शक्ति रखती है।


🪔 सीख: सच्ची श्रद्धा और शुद्ध दिल से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती। भगवान को हमारे बाहरी उपहारों से नहीं, बल्कि हमारे अंतरंग विश्वास से ही संतुष्टि मिलती है।

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