गांव के उस पुराने मिट्टी के घर में जब छत की मरम्मत हो रही थी, तो कारीगर को एक जर्जर किताब के डिब्बे के बीच एक लिफाफा मिला। लिफाफे पर ज़रदोज़ी का काम था, और उसके भीतर एक सफेद चिट्ठी थी, जिस पर हाथ की लिखावट अभी भी स्पष्ट थी। घर की मालकिन, सत्तर साल की दादी माता को जब यह चिट्ठी दी गई, तो उनके हाथ कांपने लगे।
“यह तो… यह तो राज़ू की चिट्ठी है,” दादी माता फुसफुसाईं। राज़ू उनका भाई था, जो पचास साल पहले शहर चला गया था, और फिर कभी वापस नहीं आया। परिवार में यह माना जाता था कि वह अपने सपनों में गांव को भूल गया, पर सच बिल्कुल अलग था।
चिट्ठी को पढ़ते ही दादी माता की आंखों से आंसू बह निकले। राज़ू ने लिखा था: “बहन, मैं तुम्हें लिखना चाहता हूं पर नहीं लिख सकता। पिता जी ने मुझसे कह दिया था कि अगर मैं शहर गया, तो घर में फिर मेरा कोई स्थान नहीं होगा। मां को इसका दर्द न सताए इसलिए मैं कभी संदेश नहीं भेज सका। पर हर दिन मैंने इसी घर का सपना देखा है, इसी आंगन की मिट्टी को याद किया है।”
चिट्ठी में और भी था। राज़ू ने लिखा कि उसने शहर में एक स्कूल खोला था, जहां गरीब बच्चों को पढ़ाया जाता था। उसका यह सपना अपने गांव से ही आया था, जहां दलित बच्चों को पढ़ने की इजाज़त नहीं थी। शहर में वह उसी तकलीफ को दूर करने का काम कर रहा था।
दादी माता ने तुरंत गांव के एक सम्मानित व्यक्ति को भेजा। वह दिल्ली गया। उसे पता चला कि राज़ू अब नहीं रहा, पर उसके स्कूल में अब तीन हज़ार बच्चे पढ़ते हैं। राज़ू की बेटी उस स्कूल को चला रही है।
जब राज़ू की बेटी अपनी बहू और पोते के साथ गांव आई, तो दादी माता ने उसे अपने सीने से लगा लिया। घर फिर से पूरा हो गया था। उन्होंने समझा कि प्रेम कभी खोता नहीं है, सिर्फ कभी-कभी मौन रह जाता है। और वह मौन, जब टूटता है, तो हज़ार शब्दों से ज़्यादा बोलता है।
🪔 सीख: प्रेम और कर्तव्य की बाहरी दीवारें कितनी भी मजबूत क्यों न हों, हृदय का बंधन सदा अटूट रहता है। समझ और क्षमा से कभी देर नहीं होती, भले ही बरसों बीत जाएं।

