सोने का खेत, दिल का जश्न
राजस्थान के छोटे से गांव फुलवारी में बैसाखी का त्योहार आने वाला था। किसान दादा गिरधारी सिंह को इस साल की फसल पर विशेष गर्व था। पूरे साल की मेहनत, हल चलाने की पीड़ा, और भादों की गर्मी में जल भरने का सब कुछ अब सफल होने वाला था।
गिरधारी सिंह के पोते रवि को खेत की गंध से प्यार था। जब दादा ने कहा कि इस बार खेत में ही पहली गीत की शुरुआत होगी, तो रवि खुशी से नाच उठा। गांव की महिलाओं को खबर मिल गई। ढोलक, ढोल और नगाड़े निकाल लिए गए।
फसल कटाई का दिन आया। सुबह की गुलाबी रोशनी में गांव की महिलाएं परंपरागत लाल और पीली साड़ियों में खेत की ओर चलीं। उनके गहने खनखनाते थे, हाथों में दहलीज भरी थी। गिरधारी सिंह के गेहूं के सोने जैसे खेत हवा में लहरा रहे थे।
रवि का बड़ा भाई प्रदीप अपनी बांसुरी लेकर खड़ा हो गया। पहली झलक में ही खेत के बीचों-बीच गीत का फव्वारा उठ गया। बुजुर्ग दादी अंजली ने परंपरागत बैसाखी गीत शुरू किया – ‘रबी की फसल, सोने की बालियां, हमारी मेहनत, धरती की कहानियां।’ एक-एक कर सभी महिलाएं गाने लगीं।
खेत के कोने में एक छोटी सी चूल्हा बना था जहां गुड़ और तिल के लड्डू बन रहे थे। पड़ोसी किसानों की पत्नियां इसे बांट रही थीं। रवि दौड़ते हुए लड्डू खा रहा था, उसका मुंह गुड़ से लिपा हुआ था।
दोपहर तक गांव के सभी परिवार खेत में पहुंच गए। बूढ़े दादा दोपहर की धूप में अपनी पगड़ी सीधी करते हैं, गिरधारी सिंह हर किसान को गले लगाते हैं। खेत में चारपाई बिछी थी, आम के पेड़ के नीचे दालें और खीर तैयार की गई थीं।
जब सूर्य पश्चिम की ओर ढलने लगा, तो गांव की नई दुल्हन श्रीमती रवि ने ढोलक बजाई। पहली बार किसी महिला ने त्योहार में खुद ढोलक बजाई। गांव में नई परंपरा का जन्म हुआ।
शाम ढलते-ढलते पूरा गांव खेत में नाच रहा था। सोने की गेहूं की बालियों के बीच, मिट्टी की खुशबू में, छन-छन करते पीतल के बर्तनों के बीच, फसल कटाई का जश्न अब गांव के हर दिल का त्योहार बन गया। गिरधारी सिंह आंसू पोंछते हैं क्योंकि उसे एहसास हो गया कि यह केवल फसल नहीं, बल्कि समाज के रिश्तों की कटाई और प्रेम के बीजों की बुआई थी।
🪔 सीख: फसल कटाई का सच्चा जश्न तब पूरा होता है जब पूरा गांव एक-दूसरे के सुख में शामिल हो। मेहनत का फल तभी मीठा होता है जब उसे सभी के साथ बांटा जाए।

