बरगद की बूढ़ी छाया
गांव के चौपाल के पास जो विशाल बरगद का पेड़ था, उसकी जड़ें पचास साल पुरानी थीं। दादी माता कहती थीं कि जब वह नववधू बनकर इस गांव आई थीं, तब भी यह पेड़ बड़ा ही मजबूत था। उसकी लटकती हुई बेलें और घनी शाखाएं पूरे चौपाल को एक हरी-भरी छतरी की तरह ढके रहती थीं।
नौ साल का लड़का राज हर दोपहर स्कूल से लौटकर सीधा इसी पेड़ के नीचे दौड़ा चला आता था। दादी माता वहीं बैठी रहतीं, उनकी झुर्रीदार कोमल हथेलियों में सूत के गोले, और उनकी स्मृतियों का अनंत खजाना। ‘आओ बेटा, तुम्हारे दादा-दादी भी इसी छाया में बैठकर गांव की पुरानी बातें सुनते थे,’ वह कहतीं।
बरगद की छाया में बैठते ही राज को एक जादुई सन्नाटा घेर लेता था। दादी माता का कांपता हुआ हाथ उसके सिर पर रखते हुए कहानियां सुनाई देतीं — पचास साल पहले का भयंकर अकाल, जब इसी पेड़ के नीचे सारा गांव भीख मांगने आता था; बाढ़ की रातें जब परिवारों ने इसी शाखाओं पर सो कर रात काटी थी; शादियों की खुशियां जब दूल्हे-दुल्हन को इसी पेड़ के नीचे पहली बार मिलवाया गया था।
‘यह पेड़ हमारी पारिवारिक धरोहर है बेटा। इसकी हर पत्ती हमारे किसी न किसी रिश्तेदार की यादें संजोए हुए है,’ दादी माता की आंखें नम हो जातीं।
एक दिन राज ने दादी माता से पूछा, ‘दादी माता, अगर यह पेड़ कट जाए तो क्या होगा?’ उनका चेहरा पीला पड़ गया। ‘नहीं बेटा, कभी नहीं। इस पेड़ को जीवित रखना हमारी जिम्मेदारी है। यह सिर्फ एक पेड़ नहीं है, यह हमारे पूर्वजों की आत्मा है।’
जब दादी माता का देहांत हो गया, तब भी राज रोज इसी छाया में बैठता था। और अब बीस साल का हो चुका राज जब अपने छोटे भाई को कहानियां सुनाता था, तो बिल्कुल वैसे ही बैठता था, जैसे दादी माता बैठती थीं। ‘सुनो, इस पेड़ के नीचे तुम्हारी परदादी ने अपनी पहली सास को कुछ कड़वे शब्द सुने थे, और फिर क्षमा मांगी थी…’ राज की आवाज़ में दादी माता का सन्नाटा गूंजता था।
गांव के जो लोग पहले चले जाते हैं, और शहर में बस जाते हैं, वे भी दशहरे की छुट्टियों में लौटते हैं, इसी बरगद की छाया में। क्योंकि यह छाया केवल तापमान को कम नहीं करती, बल्कि आत्मा को घर ले आती है।
🪔 सीख: परिवार की यादें और परंपराएं एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हमें जोड़े रखती हैं। जड़ों को संभालना ही भविष्य को सुरक्षित रखना है।

