गांव के दो भाई
सालों पहले राज और प्रज दोनों भाई एक ही खेत को लेकर झगड़ गए थे। उनके पिता ने मरते समय पूरी ज़मीन उन्हें बराबर बांटनी चाही थी, पर विभाजन का कागज़ अधूरा रह गया था। राज को लगा कि बड़ा होने के नाते उसे ज्यादा हक़ है, जबकि प्रज को विश्वास था कि पिता दोनों को बराबर देना चाहते थे। यह झगड़ा इतना बढ़ा कि वे एक-दूसरे से बात भी नहीं करते थे।
राज की बेटी मीरा और प्रज का बेटा कुंदन दोनों बचपन के सबसे अच्छे दोस्त थे। पर पिछले दो साल से उन्हें भी एक-दूसरे से दूरी बनानी पड़ी थी क्योंकि घर के बड़े अपना झगड़ा दोनों नई पीढ़ी तक ले आए थे।
एक बारिश की रात को विवाद वाली ज़मीन के बीच से एक खूब तेज़ पानी की धारा निकल आई। पूरे गांव को डर हो गया कि कहीं नहर टूट न जाए। राज अकेले उस धारा को रोकने गया, पर वह असंभव था। ठीक उसी समय प्रज भी वहां पहुंचा। दोनों ने एक-दूसरे को देखा, फिर दोनों ने बिना कोई बात किए पत्थर, मिट्टी और लकड़ियां लगाईं। पूरी रात दोनों भाई कंधे से कंधा मिलाकर गांव के खेतों को बचाते रहे।
सुबह जब धार रुक गई, तो दोनों थके-हारे एक-दूसरे के सामने खड़े थे। राज की आंखों से आंसू बह रहे थे। वह बोला, ‘भैया… मुझे माफ़ कर देना। हम दोनों ने जो समय खो दिया, वह कभी वापस नहीं आएगा।’ प्रज ने अपने भाई को गले से लगा लिया।
दोनों ने ज़मीन बांटने का फैसला किया, पर एक नए तरीके से। उन्होंने अपनी ज़मीन का कुछ हिस्सा गांव के लिए खुला रखा, जहां बच्चे खेल सकें और बुज़ुर्ग बैठ सकें। बाकी़ ज़मीन उन्होंने दोनों के बीच सुखपूर्वक बांट दी।
अब राज और प्रज हर सुबह अपने खेतों में एक-दूसरे को देखते, हाथ हिलाते और मुस्कुराते थे। मीरा और कुंदन फिर से दोस्त बन गए, और पूरे गांव में उनकी खुशी ही खुशी फैल गई। ज़मीन से ज़्यादा क़ीमती उनका रिश्ता था।
🪔 सीख: जब तक हम अपने प्रिय लोगों का मूल्य समझते हैं तब तक नहीं, जब तक उन्हें खोने का डर नहीं आता। संपत्ति का कोई मूल्य नहीं है अगर परिवार और रिश्ते टूट जाएं। सच्चा सुख रिश्तों की मजबूती में है, न कि संपत्ति की संचय में।




