गांव के छोर पर एक पुरानी हवेली थी, जहां दादी अकेले रहती थीं। हर दिवाली को उनके सभी बेटे-बहुएं शहर से आते थे, लेकिन इस बार किसी को छुट्टी नहीं मिल सकी। दादी ने दिवाली की सफाई करते-करते अपने हाथों में मिट्टी का कणा लगा रखा था। उन्होंने सोचा कि इस बार दिवाली अधूरी रह जाएगी।
गांव के इकलौते स्कूल से नौ साल का राज निकला। उसके पिता शहर में काम करते थे और माता भी साथ चली गई थी। राज दादी के पास रहता था। उसने देखा कि दादी के आंगन में दिवाली की तैयारी अधूरी है। घर में कोई रंग नहीं, कोई खुशियां नहीं।
राज ने दादी से कहा, ‘दादी, मैं आपकी दिवाली बना दूंगा।’ दादी हंस दीं, पर राज गांव के बाजार दौड़ा। उसके पास बस अपनी जेब-खर्च के पैसे थे। उसने मिट्टी के दिये खरीदे, रंग खरीदे, और अपने स्कूल के दोस्तों को बुला लिया।
शाम ढलते-ढलते, दादी की हवेली पूरी तरह बदल गई। आंगन में राज और उसके दोस्तों ने दीये रखे थे। हर दिये पर रंगों से चेहरे बनाए थे—कोई हंसता हुआ, कोई खेलता हुआ। दीयों की पंक्तियां सीढ़ियों तक जाती थीं। घर के कोने में राज ने अपने हाथों से रंगोली बनाई थी—फूलों की डिजाइन, जो उसकी दादी को सबसे ज्यादा प्रिय थीं।
जब शाम की अंधकार घिरने लगी, तो राज ने सभी दीये जला दिए। सोने के रंग की रोशनी पूरे आंगन को भर गई। दादी की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। वह अपने पोते के सिर पर हाथ रखती रहीं, कुछ कह ही नहीं पाईं। गांव के बाकी बच्चे भी आ गए, और वह रात पूरी हवेली में हंसी-खुशियों से गूंजती रही।
जब रात गहरी हो गई और तारे निकल आए, तो दादी ने राज को गोद में बैठाया। उन्होंने कहा, ‘बेटा, दिवाली रोशनी की नहीं, प्यार की पर्व है। तुमने मुझे सिखा दिया कि कोई भी अपनों के लिए कुछ भी कर सकता है।’ राज ने अपनी दादी को गले लगा लिया। उस रात, दोनों के लिए यह दिवाली किसी भी हीरे-मोती से कम नहीं थी।
🪔 सीख: सच्ची खुशियां भौतिक चीजों में नहीं, बल्कि अपनों के लिए हृदय से किए गए प्रयासों में छिपी होती हैं। प्रेम और समर्पण से रची गई यादें जीवन भर साथ रहती हैं।



