गांव के किनारे जो विशाल सरसों का खेत था, वह बसंत ऋतु में सोने की नदी बन जाता था। इस बार मेला भी वहीं लगने वाला था। छोटी सी बालिका मीरा अपनी दादी के साथ मेले की तैयारी करने निकली थी। उसकी पीली चुनरी हवा में लहरा रही थी, बिल्कुल सरसों के फूलों जैसी। दादी ने उसका हाथ पकड़ा और कहा, ‘देख बेटा, इस साल का बसंत मेला होगा सबसे खूबसूरत।’
गांव के सभी घरों से महिलाएं निकल पड़ीं अपनी पीली-नीली चुनरियों पहनकर। वे गीत गाती हुई सरसों के खेत की ओर जा रही थीं। मीरा के पिता और भैया भी मेले का मंच सजाने निकल गए थे। बाजार से आई पीतल की घंटियां, रंगीन झूले और मिठाई की दुकानें सब कुछ तैयार हो रहा था।
मीरा को याद आया कि गत वर्ष उसकी दादी बीमार थीं और मेला नहीं देख सकीं। इस बार वह अपनी दादी को मेले का सबसे अच्छा अनुभव देना चाहती थी। उसने दादी से पूछा, ‘दादी जी, आप बसंत को क्यों इतना प्यार करती हैं?’ दादी मुस्कुराईं और कहा, ‘बेटा, बसंत नया जीवन लाता है। जैसे यह सरसों सोते हुए बीज से जाग जाती है, वैसे ही हमारे मन भी जाग जाते हैं।’
मेले के दिन सुबह ही गांव में चहल-पहल हो गई। सरसों के पीले फूलों के बीच से देशी ढोलक की आवाज़ें गूंजने लगीं। पीली चुनरियों वाली महिलाओं की टीम में दादी भी शामिल थीं। उनका चेहरा बसंत की धूप में चमक रहा था। मीरा ने अपनी दादी को आंगन के सरसों के फूल पहना दिए। ‘आप देखें दादी, आप खुद एक सरसों के फूल बन गई हैं!’ वह खुशी से चिल्लाई।
मेले में गीत-नृत्य, झूलों की किलकारियां, मिठाई की सुगंध सब कुछ था। लेकिन मीरा को सबसे प्यारा लगा अपनी दादी की हंसी। जब दादी झूले पर बैठीं और हवा में उड़ी उनकी पीली चुनरी, तो मीरा को लगा कि बसंत सिर्फ एक ऋतु नहीं, एक भावना है। वह उन क्षणों को अपने दिल में बांध लिया।
शाम को जब सूरज पीला हो गया, मीरा ने अपनी दादी को पूछा, ‘दादी, अगले साल भी मेला होगा न?’ दादी ने प्यार से मीरा का माथा चुंबन किया और कहा, ‘हां बेटा, बसंत हर साल आएगा। और हर साल तुम्हारे साथ, मैं भी यह मेला देखूंगी।’ सरसों के पीले फूलों और पीली चुनरियों के बीच, दोनों की यह कसम बसंत की हवा में गूंजती रही।
🪔 सीख: बसंत सिर्फ एक ऋतु नहीं, जीवन की नई शुरुआत का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि परिवार और प्रेम के साथ मनाए गए क्षण हमारे जीवन को सबसे रंगीन बनाते हैं। जहां भी हम हों, अपनों के साथ हर त्योहार को खूबसूरत बना सकते हैं।

