एक घने जंगल में तीन मित्र रहते थे — एक चतुर लोमड़ी, एक मजबूत भालू और एक ईमानदार खरगोश। वे सदा एक साथ शिकार खोजते और भोजन बाँटते थे। एक दिन खरगोश को जंगल की गहराई में एक चमकता हुआ सोने का बर्तन मिला, जिसमें सोने के सिक्के भरे हुए थे।
खरगोश दौड़ता-दौड़ता अपने मित्रों के पास गया और खजाना दिखाया। लोमड़ी की आँखें चमक गईं। उसने कहा, “यह खजाना हमारा है। हम तीनों इसे बराबर बाँट लेंगे।” भालू भी सहमत हो गया। लेकिन जब बाँटने का समय आया, तो लोमड़ी ने एक चाल चली।
लोमड़ी ने कहा, “भैया भालू, तुम सबसे मजबूत हो। तुम इस सोने की पहरेदारी करो, नहीं तो कोई चोर चुरा ले जाएगा।” भालू सहमत हो गया। फिर लोमड़ी ने खरगोश से कहा, “मेरे भाई, तुम सबसे तेज हो। तुम इसे दूर पहाड़ के मंदिर में छिपा आओ, जहाँ कोई नहीं जानता।”
खरगोश सीधा-सादा था, पर उसे कुछ संदेह हुआ। उसने पूछा, “लोमड़ी भैया, लेकिन फिर हम इसे निकालेंगे कब?” लोमड़ी ने पूरी योजना नहीं बताई। खरगोश ने समझदारी से कहा, “नहीं, मैं ऐसा नहीं करूँगा। या तो सब एक साथ इसे बाँट लें, या किसी तीसरे विश्वस्त को दिखा लें।”
भालू को खरगोश की बातों में सच्चाई दिखी। वह सोचने लगा। लोमड़ी गुस्से से चली गई। अगले दिन गाँव के बुजुर्ग पंचायत के सामने खरगोश ने सच्चा हाल बता दिया। पंचायत ने खजाना जब्त कर लिया और कहा कि यह गाँव का है, जिसे वापस मंदिर के खजाने में रख दिया जाएगा।
लोमड़ी को अपनी धोखेबाजी से कुछ नहीं मिला। भालू को खरगोश की ईमानदारी पर गर्व हुआ। तीनों की दोस्ती टूट गई, पर खरगोश को पता चल गया कि सच्चाई और विश्वास किसी भी दौलत से अधिय मूल्यवान हैं।
🪔 सीख: लालच और धोखेबाजी सदा हार का कारण बनते हैं, जबकि ईमानदारी और सच्चाई से दीर्घकालीन मित्रता और सम्मान मिलता है। मित्रता की बुनियाद विश्वास पर होनी चाहिए, न कि किसी लाभ पर।




