गांव के पिछले छोर पर एक छोटी सी झोपड़ी थी, जहां अकेली दादी माता रहती थीं। उनके बेटे शहर चले गए थे और साल में एक बार दिवाली पर ही आते थे। इस बार भी दिवाली आ गई, पर शहर का जीवन इतना व्यस्त था कि किसी के पास गांव आने का समय नहीं बचा। दादी माता की बुढ़ी आंखों से आंसू बहने लगे।
दिवाली की सुबह गांव भर में पतंगें उड़ रही थीं, घरों में रंग-बिरंगी रंगोलियां बन रही थीं, पर दादी की झोपड़ी सूनी ही रही। वे चुप-चाप अपने आंगन में बैठीं और पुरानी मिट्टी के दीये निकालने लगीं। ये वही दीये थे जो कभी उनके बेटे बनाते थे।
दोपहर को गांव की सबसे गरीब परिवार—मोहन, सोहन और उनकी माँ—दर-दर भीख माँगते घूम रहे थे। दादी माता ने उन्हें देखा। उनके चेहरे पर दिवाली की खुशी नहीं थी। दादी अपने भीतर की सारी दर्द भूल गईं। उन्होंने अपनी झोपड़ी में तीनों को बुलाया।
‘बेटा, तुम्हारे पास दीये हैं?’ दादी ने पूछा। मोहन ने सिर हिलाया। दादी ने अपने सभी मिट्टी के दीये निकाले, दोनों बच्चों को दे दिए। फिर उन्होंने अपने सिमित राशन से खीर बनवाई। मोहन की माँ का चेहरा खिल गया। सोहन खुशी से चिल्लाया, ‘दादी माता, आप हमारी दादी हो गईं!’
शाम को जब तीनों ने दीये जलाए और घर-घर जाकर दिवाली की बधाई दी, तो पूरे गांव को अहसास हुआ कि असली दिवाली तो दादी माता ने दी थी। एक पल के लिए दादी की अकेलापन गायब हो गया। उनकी झोपड़ी अचानक पूरे गांव का घर बन गई।
रात को, जब तारे निकले, दादी माता अपनी झोपड़ी में बैठकर मुस्कुरा रहीं। शहर से फोन आया—उनके बेटे ने कहा, ‘माँ, हम दिवाली पर आ गए। गांव पहुंचते ही सुना कि तुमने पूरे गांव को रोशन कर दिया।’ दादी के गालों पर खुशी के आंसू बहने लगे। असली दिवाली तो तब आई, जब उनका बेटा घर लौटा और उन्हें गले लगाया।
उस दिन से हर दिवाली पर दादी माता, मोहन और सोहन के साथ दीये जलाती हैं। और बेटे ने भी समझ लिया कि परिवार की असली खुशी तो रिश्तों को बांटने में है, न कि उन्हें दूर से देखने में।
🪔 सीख: त्योहार केवल रंगों और दीयों से नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और रिश्तों को समर्पित करने से सजते हैं। जब हम दूसरों की खुशी में अपना दुःख भूल जाते हैं, तो असली त्योहार मनाते हैं।


