गांव की रात गहरी हो चुकी थी। मीरा अपनी दादी की गोद में सिर रखे, उनके हाथों की नरम सहलाई महसूस कर रही थी। दादी की झुर्रीदार आंखें मीरा के चेहरे पर प्यार से उतरीं। “बेटा, आज मैं तुम्हें अपनी सबसे प्रिय कहानी सुनाती हूं,” दादी ने कहा।
“पचास साल पहले हमारे गांव में एक बुजुर्ग महिला रहती थी, जिसका नाम सरिता था। वह बहुत गरीब थी, लेकिन उसके पास एक सोने का चिराग था – उसकी माता ने उसे दिया था। सरिता इस चिराग को रोज रात में जलाती थी और सोचती थी कि इसे कैसे बेचकर अपनी रोटी का जुगाड़ करे।”
दादी रुकीं और मीरा की आंखें बड़ी हो गईं। “एक दिन गांव में भीषण तूफान आया। सब कुछ अंधकार हो गया। उस रात, सरिता का चिराग ही एकमात्र रोशनी थी। बीमार गुलाब की दादा अपनी नाती को खोजे फिर रहे थे, और उन्होंने सरिता के चिराग की रोशनी देखी। उसी रोशनी ने उन्हें सही रास्ता दिखाया।”
“जब तूफान शांत हुआ, तो पूरा गांव सरिता के घर आया। उन्होंने देखा कि कैसे उसके चिराग ने कई परिवारों को रास्ता दिखाया। गुलाब की दादा ने सरिता से कहा – ‘बेटा, तुमने हमारी सबसे कीमती चीज़ बचाई। तुम्हारा चिराग केवल सोना नहीं है, यह आशा की रोशनी है।'”
“लेकिन दादी, सरिता ने तो चिराग बेचा क्यों नहीं?” मीरा ने पूछा।
दादी मुस्कुराईं। “क्योंकि बेटा, जब हम अपनी चीज़ों को दूसरों के काम आने देते हैं, तो वे कितनी भी कमजोर क्यों न हों, असली कीमत पाते हैं। सरिता का चिराग सोने का बनाया नहीं रहा, वह दिलों का बनाया बन गया।”
“उस दिन के बाद, गांव के सभी लोगों ने सरिता की देखभाल की। उसे कभी भी भूखा सोना नहीं पड़ा। क्योंकि जब हम दूसरों की रोशनी बनते हैं, तो खुद ही सबकी रोशनी बन जाते हैं।” दादी ने मीरा की माथे पर चुम्बन किया।
मीरा की आंखें नींद से बंद होने लगीं, लेकिन उसके होंठ पर एक मुस्कान थी। वह सपनों की दुनिया में चली गई, जहां सोने के चिराग की रोशनी पूरे गांव को रोशन कर रही थी।
🪔 सीख: असली कीमत उन चीजों की नहीं है जो हमारे पास हैं, बल्कि उस प्रेम और करुणा की है जिससे हम दूसरों की सेवा करते हैं। जब हम अपने गुणों और संपत्ति को दूसरों के भलाई के लिए लगाते हैं, तो हम सच में अमीर बन जाते हैं।







