धनपुर गांव में बसंत ऋतु का आगमन हुआ था। खेतों में सरसों के फूल खिल गए थे और हवा में पुरानी यादों की खुशबू थी। इसी समय मेहरुन की शादी तय हुई थी। मेहरुन पड़ोसी गांव की लड़की थी, जिसे शहर की पढ़ाई पूरी करके वापस आए दो साल हो गए थे।
शादी की तैयारी शुरू हुई तो गांव की सभी महिलाएं इकट्ठी हो गईं। सबसे आगे थीं मेहरुन की दादी माता, जो अपने साथ सदियों के लोकगीत लेकर चलती थीं। उनके हाथों में मेहंदी लगाने के समय महिलाओं ने जो गीत गाए, वे पीढ़ियों से चले आ रहे थे। ‘सखी री, सखी, ब्याह की बेला आई’ – यह गीत दादी माता की आवाज़ से निकलता था तो गांव की पूरी हवा मेरे रंग में रंग जाती थी।
पर मेहरुन को ये सब अजीब लगता था। उसने दादी माता से कहा, ‘दादी जी, ये पुरानी बातें हैं। आजकल तो बस डीजे बजता है।’ दादी माता की आंखों में दर्द उतर आया। वह चुप हो गईं, लेकिन शादी की रात तक उनके गीत गांव की हवा में गूंजते रहे।
शादी की दूसरी सुबह, मेहरुन को बहू के रूप में घर की रस्मों में शामिल होना था। घर की बहुओं ने उसे सिखाया – किस तरह चूल्हे पर खीर पकाई जाती थी, किस तरह घर के देवताओं को दीप दिखाए जाते थे। और हर काम के साथ, दादी माता के मुंह से निकलता था एक गीत, एक कहानी, एक परंपरा।
धीरे-धीरे मेहरुन को समझ आने लगा। जब वह दादी माता के साथ सुबह जल्दी उठकर तालाब पर पानी भरने जाती, तो दादी माता गाती – ‘जल जल करत नहीं रे, प्रेम प्रेम करत है’। ये गीत सिर्फ शब्द नहीं थे, ये घर की नींव थी, रिश्तों का सूत्र था।
एक दिन मेहरुन ने अपनी सास से पूछा, ‘दादी जी इन गीतों को इतना प्यार क्यों करती हैं?’ सास बोलीं, ‘बेटा, ये गीत हमारे पूर्वजों की आवाज़ें हैं। जब हम इन्हें गाते हैं, तो हम न सिर्फ शब्द गाते हैं, बल्कि हजारों साल की परंपरा को ज़िंदा रखते हैं।’
वह रात को जब दादी माता सो गईं, तो मेहरुन ने उनके पास बैठकर एक कॉपी निकाली और सभी गीत और उनके अर्थ लिखने लगी। अगले दिन दादी माता ने देखा तो उनकी आंखें खुशी से भर आईं। उस दिन से मेहरुन रोज़ दादी माता से एक नया गीत सीखने लगी, न सिर्फ गाने के लिए, बल्कि अपनी आने वाली बेटी को सिखाने के लिए।
बसंत गया, ग्रीष्म आया, और गांव के हर घर में दोपहर के खाने के समय मेहरुन की आवाज़ सुनाई देती थी, दादी माता के गीतों को गुनगुनाती हुई। और दादी माता मुस्कुराते हुए अपनी पोती को गोद में लेती और कहती, ‘देख बेटा, यही तो है हमारी संस्कृति – जो हम एक दूसरे को देते हैं, जो हम आगे बढ़ाते हैं।’
🪔 सीख: परंपरा और आधुनिकता का सच्चा मेल तब होता है जब हम अपनी जड़ों को सम्मान देते हैं। पुरानी परंपराएं सिर्फ अतीत की बातें नहीं हैं, बल्कि हमारी पहचान और अपनत्व का स्रोत हैं। जब हम लोकगीतों, रस्मों और परंपराओं को सीखते और सिखाते हैं, तो हम सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि प्रेम, संस्कार और एकता को आगे बढ़ाते हैं।

