गांव के किनारे, पीपल के पेड़ के नीचे एक छोटा सा स्कूल था। इसकी दीवारें मिट्टी की थीं और छत खपरैल की। यहां पढ़ाते थे मास्टर जी—दाढ़ी वाले, आंखों पर चश्मे वाले, पर दिल में पूरे गांव के बच्चों के लिए प्यार भरा था।
मास्टर जी का पहली पाठशाला से ही एक नियम था—हर सुबह बच्चे आते, तो पहले सभी को पीपल के पेड़ के पास खड़े होकर पढ़ने का संकल्प लेना पड़ता। ‘ज्ञान ही शक्ति है,’ मास्टर जी हर दिन कहते।
लेकिन बच्चे तो बच्चे होते हैं। राजू, पिन्ना और मोहन—ये तीनों मास्टर जी के सबसे ‘चंचल’ शिष्य थे। एक दिन इन्होंने क्या किया? पाठशाला के पीछे की दीवार पर गुलाबी गेंद छुपा दी, ताकि छुट्टी के समय खेल सकें। पर मास्टर जी को पता चल गया।
मास्टर जी ने कोई गुस्सा नहीं किया। बस मुस्कुराए और कहा, ‘शरारत करना ठीक है, पर छिपाना गलत है। अगर खेलना चाहते हो, तो सच्चाई से मांग लो।’
अगले दिन मास्टर जी ने पाठशाला के आगे एक छोटा सा खेल का मैदान बनवा दिया। सभी बच्चों को गेंद दी, बल्ली दी। और हर दोपहर पढ़ाई के बाद खेल का समय निर्धारित कर दिया।
राजू, पिन्ना और मोहन को यह बदलाव अजीब लगा। एक दिन राजू ने पूछा, ‘मास्टर जी, आप गुस्सा नहीं हुए हमारी शरारत पर?’
मास्टर जी ने चश्मा उतारा, अपनी आंखें पोंछीं और कहा, ‘बेटा, गुस्सा करना आसान है। समझना कठिन है। मैं समझ गया कि तुम्हारे अंदर ऊर्जा है, खेल की चाह है। इसलिए मैंने इसे गलत रास्ते से सही रास्ते पर ला दिया।’
उस दिन के बाद, पूरा गांव बदल गया। बच्चों ने पढ़ाई में भी ध्यान दिया और खेल में भी। मास्टर जी का स्कूल केवल अक्षर सिखाने की जगह नहीं रह गया—यह एक घर बन गया, जहां हर बच्चे को अपनी क्षमता पहचानने में मदद मिलती थी।
बरसों बाद, जब वो बच्चे बड़े हो गए, तो गांव में कहा जाता था कि मास्टर जी के स्कूल के बच्चे ही सबसे ईमानदार और सफल होते हैं। क्योंकि उन्होंने सीखा था कि सच्चाई और प्रेम, किसी भी शरारत को सही काम में बदल सकते हैं।
🪔 सीख: शरारत करना बचपन का हिस्सा है, पर सही दिशा देना प्यार का काम है। एक अच्छा शिक्षक बच्चों को दंडित नहीं करता, बल्कि उन्हें समझता है और उनकी ऊर्जा को सही रास्ते पर लगाता है।


