पंचायत का न्याय
भीमा गांव की पंचायत के सामने जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। उनका गुस्सा ऐसा था जैसे आंधी आ गई हो। उनके पड़ोसी राम ने उनके खेत से सीमा की दीवार तोड़ दी थी और आधा एकड़ ज़मीन हड़प ली थी। “यह ज़मीन मेरे पिता की थी, उनके पिता की थी!” भीमा का गला भर आया।
राम ने जवाब दिया कि यह ज़मीन पहले से ही उसकी है। दोनों के बीच लड़ाई बढ़ने लगी। गांव के लोगों ने पंचायत बुलाई। सरपंच धर्मसिंह अपनी सफेद दाढ़ी और पगड़ी के साथ बैठे थे। उनके दोनों ओर गांव के बुजुर्ग और ज्ञानी लोग बैठे थे।
“बताओ भीमा, तुम्हारे पास क्या सबूत है?” धर्मसिंह ने धीरे से पूछा। भीमा के पास तो कुछ नहीं था, सिर्फ अपने दादा के शब्द थे। तब राम ने कहा कि उसके पास पुरानी दस्तावेज़ है। पर जब दस्तावेज़ निकाली गई, तो वह घिसी-पिटी और जाली दिखाई दीं।
धर्मसिंह ने सबको शांत बैठने के लिए कहा। फिर उन्होंने एक बुद्धिमान फैसला दिया। “यह ज़मीन तो शायद दोनों की है, पर हमें सच जानने के लिए भीमा की बहू से मिलना चाहिए। वह उस पुरानी ख़ेत की ओर रोज़ पानी भरने जाती है।” गांव की वह लड़की आई और उसने बताया कि अपनी सास से सुना था कि भीमा के दादा ने राम के दादा को कुछ ज़मीन उपहार में दी थी, पर यह खेत सीमांत पर है।
धर्मसिंह ने दोनों को समझाया, “भीमा, तुम्हारे दादा ने एक बार कहा था कि सच्चा धन तो ईमानदारी है। राम, तुमने झूठ बोला और जाली कागज़ दिखाए। यह गलत है।” फिर उन्होंने फैसला दिया कि ज़मीन को बराबर भाग में बांट दिया जाएगा, और दोनों को एक साथ खेती करनी होगी।
भीमा के चेहरे पर शांति आ गई। राम को भी अपनी गलती समझ आ गई। दोनों ने एक-दूसरे के सामने पंचायत में क्षमा मांगी। सरपंच मुस्कुरा दिए। गांव में शांति फिर से लौट आई।
🪔 सीख: सच्चा न्याय झूठ से नहीं, बल्कि सच्चाई और ईमानदारी से आता है। विवाद का सबसे अच्छा समाधान आपस की समझदारी और समझौते में होता है।
