राजस्थान के थार रेगिस्तान में हर साल पुष कर गांव में ऊंटों का मेला लगता था। इस बार मेला और भी जीवंत था। सोने के रंग की धूप में दर्जनों ऊंट इकट्ठा थे—उनके कूबड़ों पर रंगीन कपड़े, घंटियां और झालरें लगी हुई थीं। गहरे नीले, लाल और पीले रंग की सजावट ऊंटों को राजाओं जैसा दिखाती थी।
बारह साल का लक्ष्य अपने दादा के साथ मेले में आया था। वह गरीब किसान परिवार से था, पर उसके सपने बड़े थे। लक्ष्य की पुरानी पगड़ी मैली थी, कपड़े फटे हुए थे, पर उसकी आंखों में चमक थी। वह एक महीने से इस मेले का इंतज़ार कर रहा था।
दादा ने उसका हाथ पकड़ा और कहा, ‘बेटा, हर ऊंट की अपनी कहानी है। कोई रेगिस्तान के व्यापारी का साथी है, कोई किसी राजपूत घराने से। देखो उस सफ़ेद ऊंट को—वह दस साल से इसी मेले में आता है।’ लक्ष्य ने देखा। उस ऊंट की आंखें बूढ़े इंसान जैसी थीं—गहरी, बुद्धिमान और दर्द से भरी।
अचानक गांव की औरतें लोकगीत गाती हुई निकलीं। उनकी पगड़ियां नीले, लाल और हरे रंगों में रंगी थीं। उनके गीत में रेगिस्तान का दर्द था, ऊंटों की वफ़ादारी का गीत था। ‘ऊंट चले रे, सावण की बेला, पानी खोजे, रेत की पहेली…’ लक्ष्य को यह गीत इतना पसंद आया कि उसने अपने दादा से कहा, ‘दादा, मैं भी इस मेले को याद रखूंगा। जब बड़ा हूंगा, तो मेला लगाऊंगा, सब बच्चों को ऊंट दिखाऊंगा।’
दादा ने हंसते हुए लक्ष्य को आलिंगन में भरा। ‘बेटा, यही तो ऊंट मेले की ताकत है। हर साल यह मेला आता है, हमारे सपने लगाता है, हमें दोबारा आने का कारण देता है। तुम्हारा सपना भी पूरा होगा।’
शाम को जब धूल भरी सोने की धूप ढलने लगी, तो मेले में एक दूसरी चमक आई। सांझ की किरणों में ऊंटों की सजावट और भी चमकने लगी। घंटियों की आवाज़ और लोकगीत हवा में तैर रहे थे। लक्ष्य अपने दादा के साथ बैठ गया, एक ईंट की दीवार पर पीठ लगाकर। वह मेले को अपने दिल में उतार रहा था।
उसी समय गांव के मिठाई बेचने वाले भैया ने लक्ष्य को एक प्याली गुलाबजामुन दिया। लक्ष्य ने पूछा, ‘भैया, आप हर साल ऊंट मेले में आते हो?’ भैया बोला, ‘हां बेटा, अब पंचास साल से। इस मेले ने मुझे सब कुछ दिया है।’ लक्ष्य को समझ आ गया। ऊंट का मेला सिर्फ ऊंटों का नहीं, बल्कि सपनों का मेला था।
रात को जब लक्ष्य सोने गया, तो उसके सपनों में ऊंट दौड़ रहे थे, लोकगीत गूंज रहा था, और वह मेले को अपने हाथों से सजा रहा था। उसका सपना पूरा होगा, इसमें कोई शक नहीं था।
🪔 सीख: हर मेले, हर परंपरा के पीछे सदियों का प्रेम और सपने छिपे होते हैं। असली धन सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि वे यादें हैं जो हम अपने प्रियजनों के साथ बनाते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपते हैं।

