गांव का कवि
गांव के चौपाल पर हर शाम एक अलग ही रौनक होती थी। बुजुर्गों की सफेद दाढ़ी, युवाओं की चहक और बच्चों की किलकारी — सब कुछ एक साथ मिलता था। लेकिन जब नारायण दादा अपनी पान की पीक थूकते और कुछ कहने को तैयार होते, तो सब कुछ शांत हो जाता था।
नारायण दादा अनपढ़ थे। उन्होंने कभी स्कूल नहीं देखा। गांव के स्कूल के मास्टर साहब भी उन्हें हल्के-फुल्के अंदाज में बिठैया कहते थे — जो सिर्फ खेत-खलिहान जानता है। लेकिन गांव के लड़के-बड़े, औरतें-बुजुर्ग, सब उन्हें गांव का कवि कहते थे।
नारायण दादा को कोई किताब नहीं पढ़नी पड़ती थी। उन्हें कविता आती थी — धान की बालियों की सरसराहट से, गाय के डांव-डोल चलने से, बुजुर्ग दादी की सांसों की गति से। उन्हें कविता आती थी रास्ते के तालाब में बारिश की बूंदों के छप्पर से, मंदिर की घंटी की गूंज से, और सबसे ज्यादा — अपने गांव की खुशबू से।
एक दिन गांव में सूखा पड़ा। तीन महीने से कोई बारिश नहीं। खेत सूख गए, कुआं लगभग खाली हो गया। किसान परिवार हताश होने लगे। गांव के चौपाल पर रो-रोकर बातें होने लगीं।
उस रात नारायण दादा शांतिपूर्ण मुद्रा में चौपाल पर बैठे थे। उनके पास कोई धन नहीं था, कोई ताकत नहीं थी। पर उन्हें अपनी कविता थी। वे धीरे-धीरे बोलने लगे — न गीत की तरह, न दोहे की तरह, बस अपने दिल की पुकार की तरह:
‘यह धरती हमारी माता है, जो थक गई है। जैसे हमारी दादी-नानी कभी-कभी थक जाती हैं, लेकिन फिर भी हमें गोद में लेती हैं। यह सूख भी माता का ही पास्सन है। बारिश आएगी, जैसे बेटा घर आता है। और तब यह धरती फिर से हरी-भरी होगी, बस धैर्य रखो।’
उन्होंने कहा कि इस सूखे के दिनों में गांव वाले एक-दूसरे के करीब आ गए हैं। बड़े-छोटे सब एक पानी के बर्तन को लेकर बैठे हैं। ‘यह सूखा कुछ नहीं लिया, बल्कि हमें अपनी जड़ों से जोड़ दिया,’ दादा ने कहा।
अगली सुबह गांव भर में नारायण दादा की कविता फैल गई। लोग उसे बार-बार दोहराते थे। और अजीब बात थी — उन्हें अपने गांव पर गर्व होने लगा। दो हफ्ते बाद भारी बारिश हुई। पानी बरसा और खेत हरे हो गए। पर गांव में जो बदलाव आया वह सच में गहरा था।
नारायण दादा को गांव ने सम्मानित किया। पर वे वैसे ही रहे — चौपाल पर बैठे, पान खाते, और अपनी कविता बुनते हुए। क्योंकि उन्हें पता था कि कविता किताबों में नहीं, गांव के दिल में रहती है।
🪔 सीख: सच्ची कविता किताबों में नहीं, दिल की गहराइयों में रहती है। शिक्षा और पढ़ाई जरूरी हो सकती है, पर मानवीय संवेदना और अपने समाज से जुड़ाव ही असली ज्ञान है।


