पंचायत का न्याय
गांव नारदपुर में बरसात के दिन थे। खेतों में धान की बालियां लहरा रही थीं और आसमान में गहरे काले बादल छाए हुए थे। पंचायत के चौपाल पर ठाकुर जी की घंटी बज उठी। सभी ग्रामीण इकट्ठा होने लगे क्योंकि एक बड़ा विवाद पंचायत के सामने आया था।
मामला था दो पड़ोसियों का। रामचंद्र सिंह के यहां एक गाय थी जो कभी-कभी राम किशोर के खेत में घुस जाती थी। एक दिन गाय ने राम किशोर की पूरी सब्जियों की फसल बर्बाद कर दी। राम किशोर को बहुत गुस्सा आया और उसने गाय को पीटा। रामचंद्र सिंह ने इसे अपना अपमान माना और दोनों के बीच कड़वाहट बढ़ गई। अब दोनों ही पंचायत के सामने खड़े थे, एक-दूसरे को दोष देते हुए।
पंचायत के मुखिया, बुजुर्ग हरिश्चंद्र जी ने धीरे-धीरे सभी बातें सुनीं। उन्होंने रामचंद्र सिंह से पूछा, ‘क्या तुमने अपनी गाय को बांधने का कोई इंतजाम किया था?’ रामचंद्र सिंह ने शर्मिंदा होकर सिर झुका दिया। फिर हरिश्चंद्र जी ने राम किशोर से पूछा, ‘क्या तुम एक जानवर को इंसान की तरह सजा दे सकते हो? क्या गाय को दोष था?’
राम किशोर ने भी अपनी गलती को महसूस किया। हरिश्चंद्र जी ने चौपाल के बीच खड़े होकर कहा, ‘भाइयों, न्याय वह नहीं है जहां एक जीते और दूसरा हारे। न्याय तो वह है जहां दोनों को अपनी गलती दिखे और दोनों बेहतर बनें। रामचंद्र को अपनी गाय को सुरक्षित बांधना चाहिए, और राम किशोर को अपने खेत के चारों ओर बाड़ लगानी चाहिए। सच का न्याय तब तक पूरा नहीं होता जब तक गलती करने वाले सीखते नहीं।’
उन्होंने आगे कहा, ‘और हां, रामचंद्र को राम किशोर की खराब हुई फसल का नुकसान पूरा करना चाहिए, पर राम किशोर को गाय को कभी मारना नहीं चाहिए।’ पंचायत की यह फैसला सभी को समझदारी भरा लगा।
अगले दिन, दोनों पड़ोसी साथ-साथ खेत में काम कर रहे थे। रामचंद्र गाय को मजबूत रस्सी से बांध रहा था, और राम किशोर अपने खेत के चारों ओर बाँस की बाड़ लगा रहा था। गांव के सभी लोग इस दृश्य को देखकर मुस्कुरा रहे थे। हरिश्चंद्र जी चौपाल पर बैठे हुए धीरे-धीरे कहते सुने गए, ‘यही है सच्चा न्याय, जब समस्या का समाधान दोनों की बेहतरी में हो।’
🪔 सीख: सच्चा न्याय वह नहीं है जहां कोई जीतता या हारता है, बल्कि वह है जहां दोनों पक्ष अपनी गलतियों से सीखते हैं और एक-दूसरे के साथ बेहतर तरीके से जीना सीखते हैं। एक न्यायप्रिय समाज वही है जहां समस्या का समाधान सभी की भलाई में होता है।

