दिवाली के दीये

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गांव के सबसे पुराने पीपल के पेड़ के नीचे बैठी दादी माँ की आँखें चमक रही थीं। उनके हाथों में मिट्टी के दीये थे — लाल, पीले, नीले रंगों में रंगे हुए। साठ साल से वह दिवाली की रात को इसी तरह गांव भर के लोगों को दीये बाँटती आई थीं। इस बार उनकी पोती मीरा और पोते राज भी उनके साथ थे।

“दादी, हर साल आप सब को एक दीया क्यों देती हो?” मीरा ने पूछा। दादी माँ मुस्कुरातीं और मिट्टी का एक दीया उसके हाथ में रख देतीं। “बेटा, हर दीया एक सपना है — किसी का खुशियों का सपना, किसी का अपने से मिलने का सपना, किसी का बीमारी से ठीक होने का सपना।”

शाम ढलने लगी। गांव की गलियों में महिलाएं रंगोली बना रही थीं — लाल, पीली, हरी रंगों की बारीक लकीरें आटे और रंगों से। बच्चे इधर-उधर दौड़ रहे थे, पटाखों की तैयारी में। कुआँ के पास से पानी भरती औरतें गीत गा रही थीं — “दिवाली आई, दिवाली आई…”

जैसे ही अंधेरा उतरा, दादी माँ का थैला खाली हो गया। गांव की हर झोपड़ी, हर पक्का घर, हर चौपाल में उनके दीये जल गए। पूरा गांव एक सोने की चादर से ढक गया। दीयों की पीली रोशनी चाँद की चाँदनी से मिल गई।

मीरा अपनी दादी के पास बैठी और देखा — चेहरे पर झुर्रियाँ, पर आँखों में जो चमक थी, वह किसी दीये की रोशनी से ज्यादा थी। “दादी, आप बहुत थक गईं होंगी।” “नहीं बेटा,” दादी बोलीं, “मेरी थकान तो यही दीये धुएँ में उड़ा देते हैं। देख, कितने सारे हाथ जुड़ गए आज। कितने सारे दिल एक हो गए।”

रात भर गांव में पटाखों की आवाज़ें गूँजती रहीं। बूढ़े चाचा और चाची नाच रहे थे। बच्चों की हँसी हवा में उड़ रही थी। खेतों में काम करने वाले किसान भी गांव आए थे, क्योंकि दिवाली किसी की अपनी नहीं होती — वह सब की होती है।

आधी रात को, जब सब सो गए, मीरा अपनी दादी के कमरे में गई। उन्होंने एक नया दीया तैयार किया था — बिना रंग का, शुद्ध मिट्टी का। “यह दीया किसके लिए?” मीरा ने पूछा। दादी हँसीं, “यह तुम्हारे लिए। आने वाली दिवाली में तुम इसे बाँटना। और जब तुम बड़ी हो जाओ, तो अपनी बेटी को सिखाना कि दीया सिर्फ रोशनी नहीं — यह जिम्मेदारी है, यह प्रेम है, यह गांव का रिश्ता है।”

मीरा ने उस दीये को अपने सीने से लगा लिया। उसी रात, उसने समझ गया कि असली दिवाली न तो पटाखों में है, न ही रंगोली में। असली दिवाली तो उन मिट्टी के दीयों में है, जो एक साथ जलकर पूरे गांव को रोशन कर देते हैं।


🪔 सीख: असली खुशियां वे हैं जो हम दूसरों के साथ बाँटते हैं। एक दीया अकेला कमज़ोर होता है, पर हज़ारों दीये मिलकर अंधकार को हरा देते हैं। त्योहार का मतलब सिर्फ अपना जश्न नहीं, पूरे समाज के साथ प्रेम और रिश्ता जोड़ना है।

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