बसंत का मेला और बुजुर्ग दादी का सपना
बिछिया गांव में हर साल बसंत ऋतु आते ही सरसों के खेत सोने की तरह चमक उठते थे। इस बार मेला लगने वाला था और सारा गांव तैयारी में लगा था। दादी माता को इस मेले का इंतजार बीस साल से था, पर कभी जा नहीं पाई थीं।
दादी की पोती गुड़िया मात्र बारह साल की थी, पर उसका दिल बड़ों जैसा पक गया था। उसने देखा था कि दादी अकेली बैठकर खिड़की से सरसों के खेतों को निहारती थीं, उनकी आँखों में एक अधूरा सपना था। गुड़िया जानती थी कि दादी के पैर कमजोर हो गए हैं, चलना-फिरना मुश्किल है, पर उनका मन अभी भी जवान था।
मेले के दिन गुड़िया ने एक योजना बनाई। वह सुबह जल्दी उठी और दादी को नहलाने में मदद की। फिर उसने अपनी माँ की पुरानी पीली चुनरी को संभालकर रखा और दादी के कंधों पर डाल दी। दादी की आँखों में खुशी की चमक आ गई।
दोनों घर से निकले—गुड़िया ने दादी का एक हाथ पकड़ा था और अपना कंधा उनके लिए सहारा बन गया। सरसों के खेतों को पार करते हुए वे मेले की ओर बढ़े। वहाँ पीले फूलों की क्यारियाँ थीं, जहाँ अन्य महिलाएं और लड़कियाँ हरी, लाल और नीली चुनरियों में झूम रही थीं। खिलौनों की दुकानें, मिठाई के ठेले, गीत गा रहे भाट, और मिट्टी की खुशबू हवा में थी।
दादी की आँखें पानी से भर गईं। वे गुड़िया के साथ धीमे-धीमे मेले में घूमीं। एक कोने में महिलाओं का समूह परंपरागत गीत गा रहा था। गुड़िया ने दादी को वहाँ बैठा दिया और अपनी दादी को गले से लगा लिया।
दादी ने कहा, ‘बेटा, तूने मेरे बीस सालों का इंतजार खत्म कर दिया। लेकिन यह मेला तो बस एक बहाना था। असली उपहार तो तुम्हारा प्यार है, तुम्हारी खुशबू है जो सरसों के फूलों से भी प्यारी है।’ गुड़िया ने दादी की पीली चुनरी को अपने सिर पर भी लपेट लिया और दोनों सरसों के पीले फूलों के बीच, बसंत की सुनहरी धूप में, एक-दूसरे के कंधे पर सिर रखकर बैठ गईं। उस पल का खुशी का रंग किसी मेले के रंगों से कहीं गहरा था।
🪔 सीख: जीवन की सबसे बड़ी खुशी किसी मेले या चीजों में नहीं, बल्कि प्रियजनों के साथ किए गए पल और उनके सपनों को पूरा करने की कोशिश में छिपी होती है। प्रेम और दयालुता ही असली उत्सव है।

