कुएं के पास की यादें
गांव के सबसे पुराने कुएं के पास एक छोटी सी झोपड़ी थी, जहां राधा अपनी दादी माता के साथ रहती थी। हर भोर में जब सूरज पूर्व दिशा से निकलता, तो राधा घड़े लेकर कुएं की ओर दौड़ जाती। उसके पैरों की आहट से गांव जाग जाता था।
कुआं सिर्फ पानी की जगह नहीं था। यह राधा की पूरी दुनिया थी। रज्जु को पकड़कर जब वह नीचे झांकती, तो उसे अपना चेहरा साफ पानी में दिखता और वह हंसने लगती। चौपाल पर बैठे बुजुर्गों की कहानियां सुनते-सुनते राधा को पता चल जाता था कि यह कुआं सौ साल से भी पुराना है।
गर्मियों की दोपहर को जब गांव में धूल उड़ती थी, तो राधा और उसकी सहेलियां कुएं की ठंडी छाया में बैठती थीं। वे गुल्ली-डंडा खेलती थीं, गिलौरी घुमाती थीं और आम की पूंछों से झूले बनाती थीं। उन दिनों कोई मोबाइल नहीं था, कोई टीवी नहीं था – सिर्फ हंसी, सिर्फ खेल, सिर्फ एक-दूसरे की संगति थी।
एक बार राधा की गुल्ली कुएं में गिर गई। सभी सहेलियां डर गईं, लेकिन राधा हंस पड़ी। चौपाल पर बैठे ठाकुर जी और बुजुर्गों ने रस्सी से उसे निकाल लिया। राधा ने जब उस गुल्ली को फिर से पकड़ा, तो उसे लगा कि पूरा गांव उसके साथ खुश हो गया है।
दादी माता हर दिन राधा को बतातीं कि कैसे उनके समय में पूरा परिवार इसी कुएं पर इकट्ठा होता था। विवाह के गीत यहीं गाए जाते थे। बच्चों का पहला स्नान यहीं होता था। खुशियां, गम, प्यार – सब कुछ इसी कुएं के चारों ओर बंटता था।
राधा जब बड़ी हुई और शहर चली गई, तो कुएं की यादें उसके साथ गईं। हर रात जब वह अपने कमरे में अकेली बैठती, तो उसे कुएं की ठंडाई, दादी की आवाज, और सहेलियों की हंसी सुनाई देती। उसे याद आता कि कैसे उस कुएं ने उसे सिखाया था कि असली खजाना यादों में होता है, रिश्तों में होता है।
आज राधा अपनी बेटी को भी वही कहानियां सुनाती है। और उसकी बेटी उस पुराने गांव को देखने के लिए बेताब रहती है, जहां एक कुआं है, जहां चौपाल पर बुजुर्ग बैठते हैं, और जहां बचपन की हर यादें किसी खजाने से कम नहीं हैं।
🪔 सीख: गांव की सादगी और रिश्तों की खूबसूरती ही असली धन है। कुएं की तरह, हर पुरानी यादें गहराई से जुड़ी होती हैं और जीवनभर हमें तरोताजा रखती हैं। समय बदलता है, लेकिन अपने जड़ों और प्रियजनों से का रिश्ता कभी नहीं बदलता।
